Sunday, 23 August 2015

कुछ साहित्यिक कविताऐं -भाग-1 -कवि विनय भारत



कहाँ गए भैया-एक बहिन का दर्द 


कहाँ गए भैया
तुम मुझे
छोड़कर
क्या तुम्हे पता हैं
आज
अकेली हूँ मैं

इस राखी को
देख देख कर
रोती हूँ मैं

लगता है भैया
मुझे
अभी अभी तुम आओगे

मुझे चिढ़ाओगे
दस बातें मनवाओगे
फिर ये राखी
बंधवाओगे

तुम पहले नखरे करोगे
फिर दस रूपये दोगे
लेकिन मैं
हाँ भैया मैं
फिर से
तुम्हे पागल
बनाउंगी

तुम्हे पांच सौ
का नोट
दिखाउंगी
जो निकाला था
भैया मैंने

कल रात
तुम्हारी जेब से

फिर मैं तुम्हे
चिढाउंगी

तुम झगडा करोगे
गुस्सा करोगे
माँ
हमे डाटेगी

फिर हम हंसेगे
भैया
तुम पतंग उड़ाओगे

मैं चरखी पकड़ूंगी
तुम्हारी पतंग को
दूर
तक
देखती रहूँगी

पतंग कट जाएगी
तुम
गुस्सा हो जाओगे

मैं तुम्हे मनाउंगी
तुम मुझसे
उधार
पैसे मांगोगे
मुझे पता हैं
तुम कभी भी

वो पैसे नही
लौटाओगे

लेकिन तुम्हारी
एक हंसी

देखकर
मैं खुशहो जाउंगी
भैया तुम
चले गए हो
इतनी दूर

जहाँ से नही
आया कोई
जाकर वापस

भैया
तुम्हारी याद आती हैं
ये राखी का दिन
कब ढलेगा

कब सूर्यास्त होगा
ये सोंचकर ही
भैया
आँखे रोती
हैं
कैसे रोकूँ भैया अपने को

मन नही मानता
माँ रोती है
पापा मन ही मन घुटते हैं
भैया याद आता हैं
बचपन

वो लड़ाई झगडे
वो नटखटपन
भैया
आ जाओ एक बार
तुम्हे
राखी बंधना चाहती हूँ

तुम्हारे साथ झगड़ना चाहती हूँ
तुम्हारे कंधे
पर सर
रखकर रोना चाहती हूँ

एक बार तो
बताओ
भैया तुम कहां हो…

भैया तुम कहाँ हो…
————–
एक दिवगंत भाई की बहिन के लिए ये त्यौहार दुःख और अभिशाप बन जाता हैं
उफ़ 



************************************
पिताजी 

कभी वो मेरे पास आते
हाल पूंछते गले लगाते
कभी कभी अतिश्योक्ति कर
मेरा जग को नाम बताते
मैं पहले तो डरने लगता
सोचने लगता
कभी कभी जब मैं गिर पड़ता
दौड़ दौड़ कर
फिर वे आते
मुझे उठाते

गले लगाते
हाथ से अपने मेरे पैरों पर
दवा लगाकर
मुझे सुलाते
कभी कभी जब जल्दी होती
मेरे जूते पोलिस करते
वस्त्र प्रेस कर
मुझे सजाते
कभी कभी
जो
मैं चिल्लाता
माँ को
फिर से
डांट लगाते
मुझे समझते
मुझे मनाते
खुद वो सूखी रोटी खाकर
मुझे अनेक
पकवान खिलाते
कभी कभी यूँ लगने लगता
मानो मैं कोई स्वर्ण रतन हूँ
या फिर हूँ
चाँदी का खिलौना
जिसको लेकर
बुनते हैं
तो
अपना अनुपम
स्वप्न सलोना
जब जब मैं
पैसे लेता था
कभी मना वे नही कर पाते
खुद अपनी इच्छा और श्रम से

मुझे सुखों की सैर कराते
कभी कभी जब
बारिश होती

खुद भीगते
मुझे बचाते
सर दर्द की एक गोली
खुद न खाकर
मुझे खिलाते
हृदय विशाल इतना था उनका
जब जब गलती करता था मैं
हलकी सी बस डांट डपट
और कभी कभी
फटकार लगाते
फिर मेरे रूठे होने पर
रात रात भर
आंसू बहाते
और मैं उनको
देखता रहता
इकटक यूँ ही
देखता रहता
लगता हैं मुझको
कभी कभी
जिस दिन
साथ नही होंगे
कैसे
जी पाउँगा
जीवन
जब मेरे पास नही होंगे
चिल्लाता हूँ
चीखता हूँ मैं
कभी कभी
उनकी बातों पर
चरण भी न छुए है मैंने
कभी किसी भी त्योहारों पर
फिर भी आत्मा उनकी कहती
दीर्घ जियो और सुखी रहो तुम
मैंने जो भी उनसे चाहा
दुगना लाकर मुझे दिया
फिर क्यूँ मैंने यूँ उनको
बुढ़ापे में छोड़ दिया
क्यों भूला हूँ
उनका जीवन
अपना बचपन उनका
वह श्रम

याद करूँ तो
आँखों में
आंसू अब आते जाते हैं
जो कभी मखमली बिस्तर देते
आज घांस पर सो जाते हैं
मुझे यूँ बैड पर सोता देख
आज भी वो खुस हो जाते हैं
मैं
इतना निर्मोही क्यूँ हूँ

क्यों उन्हें समझ नही पाता हूँ
क्यों मैं बार बार झगडा कर
उन्हें ह़ी नीचा दिखता हूँ
क्यों वे
मुझे कुछ कह नहीं पाते
क्यों

सब कुछ सुनते रहते हैं
शायद पुत्र की सोंच बदले
पिता गलत कभी
नही होते हैं
*************************


एलबम की दुनिया ...

ये एलबम नहीं है
ये झलक है
उन पलों की
जो याद दिलाते है
मानव को सुख की
उन खुशियों की
जो उसने अर्जित की थी
कभी

ये संग्रह है
उन सपनों का
जिनको पूरा करने का
ख्वाव
देखा गया था
उसके द्वारा

ये
एल्बम नहीं
ये तो जिदंगी के
वे खुशनुमा पल है
जो बिताए थे
परिवार के साथ
दोस्तों के साथ
समाज के साथ
दो पल सूकून से
काटा था जीवन
ली थी राहत की साँस

ये तो याद दिलाती है
उस वक्त की
जब घर परिवार
आदि की
चिन्ताओं से
मुक्त होकर
झूम रहा था मन
मस्ती के सागर में

हाँ,
ये सिर्फ एल्बम नहीं है

वास्तव में
ये तो वह छत है
जिसके नीचे
बाप- बेटे का
झगड़ा नहीं
स्नेह
दिखाया जाता हैं
अरे! यही तो वो घर हैं
जहाँ बूढ़ी माँ को
बेटा
गाली नहीं
प्यार के
दो
मीठे बोल
सुनाता हैं

हाँ, यही तो है
वो संसार
जो
पत्नी को
तलाक की नहीं
विवाह की याद
दिलाता हैं

हाँ ,यही तो है
वो घर बार
जो
एक भाई को
भाई से
गले मिलाता हैं

हाँ -हाँ
यही तो हैं वो
जगह जहाँ
एक फटेहाल
गरीब भी
अफसर बनकर
आता है

जी हाँ , यही तो हैं वो
पवित्र जगह
जहाँ
सभ्यता संस्कृति
संसकारों की
सरिता
बहाई जाती हैं
अरे !
यही तो हैं वो जहाँ
मुन्नी बदनाम नहीं
महान दिखाई
जाती हैं
सिर्फ यही,
हाँ ,
यही हैं वो
जहाँ
बहू विदेश से
सास को
मिलने आती है
अरे!
यही तो हैं वो
जो
नाती को
नाना,
पोते को
दादी की गोद दिलाती है
यही तो है जहाँ
छिपा रहता हैं
पिता की मुस्कान
के
पीछे का संघर्ष
यही तो है वो जहाँ
छिपी हैं कालेज के
दिनों की अठखेलियाँ
वो शरारतें
वो कैंटीन
वो दहीबड़े
वो इमलियाँ
वो सखी सहेलों का
हँसीठोला

वो कालेज पिकनिक
वो पहला पहला प्यार

हाँ,हाँ ये सिर्फ
एल्बम नहीं
ये एक दुनिया हैं
आपके जन्म से
बुढापे तक की
ये दुनिया है जो
बताती है
इस दौड – भाग की
जिंदगी में
रूके थे
दो मिनट कभी
इस फोटो को
खिंचाने को

जी हाँ ,
यही है वो
जो शहीद की माँ को
धैर्य बंधाती हैं
यही विश्व को
“वसुधैव कुटुम्बकम्”
सिखलाती है
सिर्फ यही तो हैं जो
भूतकाल को
वापस लाती हैं
यही एल्बम
आंसू और मुस्कान लाती हैं
यही तो हैं जो
रिश्तों की बुनियाद बनाती है
हाँ , ये एल्बम नहीं हैं
ये सिर्फ एल्बम नहीं हैं

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 “कालपुरुष” 


ऐसा कौन विजेता
जिसने काल को जीत लिया है
काल के मुख मण्डल से
किसका इतिहास बचा है
।काल के अट्टाहास को
कौन जो रोक पाया,
किसने काल के सीने पर
विजय का झण्डा है लहराया?।
कालदेव है वह विजेता
अब तक रहा अमर है,
अथ से लेकर इति तकधरा पर
मृत्यु हीएक सच है।
काल विजेता बनने अब तक जाने कितने आए
किसमे इतना साहस है,
जो काल को मार भगाये ।
वीरों के हाथों मे चाहे
लोहे का दम भरा है,
फिर भी अन्त मे वीरों को
काल के युद्ध में मरना पडा है।
नही जीत पाया है ,
ना कोई जीत सकेगा
बस एक ही सच है
इस धरा पर
काल ही अमर रहेगा
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म और माँ 
  “म”
ऐसा शब्द
हटाने पर जिसे
बिखऱ जाती है
भाषा हिन्दी,
संस्कृत भी
कहाँ टिक
पाती है
“म” के पुत्र
अनुस्वार के बिना
इसी “म”
की
एक महिमा है
“माँ”
जिसके बिना
कहाँ चल सकता है
कोई संसार,
वह माँ
जिसका आँचल
सिंहासन से
बढकर है

उसी “म”
शब्द से
बना हूँ
“मैं”

जो करता हूँ
शरारत
विविध अठखेलियाँ,

हाँ,
“म” शब्द से
बनी है
प्रकृति की
अनुपम छटाकृति
“माँ”

उसी माँ से
बना हूँ
“मैं”

आखिर
मिलता जुलता ही है

“म” और माँ
से
मेरा संबंध
“म” से बना
‘मैं’

व्यवहार में
‘माँ’
से आया मैं
संसार में


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‘‘कॉलेज का एक लड़का”
एक कॉलेज का लड़का वो
रोजाना सपने सँजाता है।
एक झलक पाने के लिए
रोजाना कॉलेज आता है।
बालों को वह सॅवारता
आईने में वह निहारता।
जूते पॉलिश चमकाता सा
इत्र से शरीर महकाता है।
जीन्‍स शर्ट टी शर्ट कभी
कभी सादा वस्‍त्र उठाता है।
रोज-रोज सज सँवर वह
पढ़ने कॉलेज आ जाता है।
कभी कक्षा से बाहर आता
कभी पानी पीने जाता है।
कभी ताँक झॉककर देखता
कभी बहाना कोई बनाता है।
बस एक झलक पाने को
रोजाना कॉलेज आता है।
उस लड़की में भी बात कोई
इठलाती है, इतराती है।
उस लड़के को देख-देख
हँसती है चली जाती है।
वह लड़का एक दीवाना था
रातों करवटें बदलता है।
सपने में बस उसी परी के
यशोगान वह गाता है।
और उसकी एक झलक
पाने को रोजाना कॉलेज जाता है।
वह लड़की नहीं चितचोर वह
उससे नजरें मिल जाती है।
ना वह कुछ भी कह पाती है
ना लड़का कुछ कह पाता है।
दिन, साल, महीने बीत गए
लड़का बस आँसू बहाता है।
प्‍यार भी क्‍या चीज है
अनेकों रंग दिखाता है।

 ******************************* 

वो कोई और हैं 
 वो कोई और हैं
जो
लिखता हैं
कविता कहानी और व्यंग्य
मैं हूँ साधारण
वो हैं विशिष्ट
कभी कभी
हावी होता हैं
वह
जबरन मुझ पर
और घिसता है
स्याही

लीपता हैं
कोरे कागज
फिर
निर्मित होता हैं

नया साहित्य
जी हाँ

वह मैं नही
जिसे देखते हैं
आप अखवारों में
पत्रिकाओं में
या
किसी मंच पर

बोलते हुए
वह मेरे अन्दर
का
इन्सा है
कोई दूसरा इंसा

उसके जागते ही सो जाता हूँ
मैं
एक गहरी नींद
में

उठने पर
लिखा मिलता हैं

कुछ उसका सन्देश
जो चाहता हैं
मुझे कुछ कहना

फिर
कैसे कहूँ
कि

वह मैं हूँ
क्योंकि

मुझे पता हैं
वो कोई और हैं


  *******************************
ये कैसा बदलाव 
शऱीऱ में
जगह -जगह
उग रही है
घांस

काली घांस
कुछ लोग जो
इस घांस
को
सजाया करते
हैं

कहीं सफेद
तो
कहीं
भूरी

कभी देशी
तो
कभी विदेशी
सलीके में
खिली हुई

कभी अलग थलग
सी
खडी हुई
कभी
पीछे की ओर
मुडी हुई

रंग-बिरंगी
ये घांस

पर क्या…
ये
विदेशी नकल
यूँ ही
भुला देगी
संस्कृति
हमारी सभ्यता
हमारा परिवेश

आखिर
कैसा है
ये
बदलाव

क्या रुक जायेगी
ढलती उम्र
इस
घांस को
रँगने से ¿
*******************************
 जीवन चक्र
देखा हैं मैंने
एक बीज को वृक्ष बनते हुए
फिर पतझड़ में
झडते हुए

जामी में दबते हुए
एक नया बीज बनाने को
हाँ यही है
इस संसार का

जीवन चक्र
*******************************
ये झूमता सा सावन
ये खुशियों के पल
ये मस्ती के मौसम
ये झूमता सा सावन
ये मदमस्त सी हवाएं
ये मन में फुहारें
ये चलती बहारें
दे रही है खुशियाँ और शुभकामनाएं
——
झूमते सावन को भेंट
 *******************************
मेरी आने बाली पीढ़ी के लिए एक कविता

मेरे
पुत्रों
मेरे
प्रपौत्रों

मेरे आने
बाली पीढ़ी

के रिश्तेदारों
और
वे लोग
जो जानते हैं
मेरे बारे में
थोडा कुछ
उन सभी से
कहता हूँ मैं
मेरे जाने के बाद
जब तुम सभी

पढोगे
हिन्दीसाहित्य डॉट ओ आर जी
पर
मेरी रचनायें
जब पढेंगे
तब तक
नही रहूँगा
मैं
इस संसार में
न होगा मेरा कोई
बजूद

बची रहेंगी
मेरी यादें
और मेरे ग्रन्थ
आज दो हजार चोदह
सन में
तेबिस अगस्त

को
केवल

इसलिए
कि
तुम याद रख

सको मुझे
एक कवि के रूप में
एक साहित्यकार के रूप में
मैं चाहूँगा
इस
वंश

में पैदा होते रहे
इसी प्रकार
से कविगण
जैसे यहीं
हुए हैं अभी तक
गोपीनाथ चर्चित
मेरे रिश्ते में ताऊ
उनके बाद
इश्वर ने दिया था
ये
मौका

मुझे
इसके बाद कौन
होगा
कौन जाने
लेकिन
ये
कविता
जो तुम्हे
मेरा आशीर्वाद हैं
जनता हूँ मैं
जब तुम
पढोगे ये कविता
तब तक
हो चूका होगा
इस
धरा
पर मेरा
जन्म
कही किसी
रूप
में

फिर भी साथ
रहूँगा मैं
तुम्हे
याद रहूँगा
मैं
इसी साहित्य के माध्यम से
  *******************************
 विनय भारत

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