Wednesday, 30 September 2015

प्रेम की गली से निकले दिलजले स्टेट्स - कवि विनय भारत

कहाँ हो तुम -विनय भारत

आज तुमने दिल तोड़ने की बात
क्यों कर दी

मैं तो आज दिल तुम्हे ही देने बाला था
कहाँ गयी हो छोड़कर मुझे
अय हंसी

मैं तो अभी खुद ही तेज
रोने बाला था 



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इंतज़ार – कवि विनय भारत

वो बारिश को अपना दुश्मन मान बैठे भारत
कम्बख्त हम थे
की
छतरी खोले
उनका इंतज़ार करते रहे
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यादें -कवि विनय भारत

जो तेरी एक झलक देखी
तो मन खुशियों से झूम गया
मनो कोई डूबते प्राणी को
सागर में कोई सहारा हो
तेरी यादों में रो रोकर
जो पन्ने हमने लिख डाले
मेरे जीवन की ये यादें
जो तू पढ़ती तो तू रोती 
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ये बेदर्द जमाना – कवि विनय भारत

ज़माने ने हमे अब तक दिया ही क्या है
भारत
ये तो हम हैं
की
ज़माने से अब तक

दिल लगाये बैठे हैं
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इस प्यार को क्या नाम दूँ – कवि विनय भारत

बिस्तर पर न नींद यहाँ
चेहरे पे उदासी छायी हैं
क्या नाम रखूं इस प्यार का
बस
लिखने की कलम उठाई हैं

ए खुद तू ही बता
ये प्यार हैं या है पागलपन
क्या नाम दूँ
इस प्यार को
जिसने

आँखे मेरी रुलायी हैं
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कहाँ हो तुम -विनय भारत

आज तुमने दिल तोड़ने की बात
क्यों कर दी

मैं तो आज दिल तुम्हे ही देने बाला था
कहाँ गयी हो छोड़कर मुझे
अय हंसी

मैं तो अभी खुद ही तेज
रोने बाला था 
..................................................
 

कुछ छोटी छोटी दिल से कविता-विनय भारत

तुझे छूकर हवा मेरे पास आई
लगा जैसे तुम ही
यूँ
छूकर गए मुझे …
……………………………………………………………
2.
तुझे मानना तो आता हैं
मेरे दोस्त मुझे
पर
सोचता हूँ
तुझे नाराज़ क्यूँ करें
…………………..
…………………………………………….
3.
तुझे कुछ इस कदर
चाहते हैं अय दिल
चाहकर भी तुझे यूँ कभी हम
छोड़ नही सकते
…………. ……………………………
4.
तुझसे प्यार इतना हुआ हैं अय परी
कि
देखे बिना अब तुझे दिल
मेरा नही लगता
……………………………………
6.
तुझसे करते भी हैं
तुझपे मरते भी हैं
तुझे पता नही अय दोस्त
हम
तेरे भाई से डरते भी हैं

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कवि विनय भारत

Thursday, 27 August 2015

कुछ व्यंग्य कविताएं -भाग -1 - विनय भारत

बी एड वर्क 


मैंने अपने मित्र से कहा
एक मन कहता हैं
कहानी लिख

एक मन कहता हैं नाटक लिख
एक
कहता हैं लघुकथा लिख

कभी कहता है
लिख डाल
कविता

समझ नहीं आता
लिखूँ
तो क्या लिखूँ

तभी तपाक से मेरा मित्र बोला
ना हिंदी लिख ना बिंदी लिख

अबे
साहित्य छोड

पहले सैशनल लिख


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प्याज पर बबाल 

मेरे मित्र के घर इन्कम टैक्स
का छापा पड गया
मैंने मित्र से पूँछा
यार
तू कंगाल गरीब आदमी

तेरे यहाँ छापा क्यूँ पड़ा
तेरे पास काहे की सम्पत्ति थी
वो बोल संपत्ति कहे की यार
बस पांच किलो प्याज थे

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 वाह री दोस्ती
वे बोले –
आप बहुत कम – कम बोलते हो
हमने कहा –
बोलती बंद हो गयी हमारी
जबसे आप दोस्त हुए
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मेरे उपनामकरण पर कविता




मेरे दोस्तों ने मुझसे पूंछा कि
आप भारत क्यूँ लगाते हैं
मैंने कहा –
भारत में रहते हैं भारत की खाते हैं
भारत लगाने में हमारा क्या जाता है
भारत में जन्म लिया भारत में शिक्षा ली है
भारतीय बच्चों को भारत में पढ़ाते है
भारत ही राष्ट्र मेरा भारत ने सब दिया है
भारत की माटी को हम शीश
झुकाते हैं

इसीलिए विनय शर्मा भारत लिखा करते हैं
भारत में रहके विनय भारत लगाते है 

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 मेरे देश की अशिक्षा 

मुझे मेरे देश की
अनपढ़ता का
पता
तब चला

जब एक
रेलवे स्टेशन पर

विक्रेता से
ग्राहक द्वारा
बीडी का बंडल
माँगा गया
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मेरे देश की दुर्दशा 
मुझे मेरे
देश की दुर्दशा
का पता
तब चला
जब एक नोनवेज होटल के बाहर लिखा था

यहाँ बकरे का
“शुद्ध” मीट मिलता हैं
हाय देश की
दुर्दशा
यहाँ भी मिलावट ! 
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मंच सञ्चालन पर तालियों के लिए
दुःख सुख जिसके कभी साथ नहीं
उस जीवन में कुछ खास नही
वो महफिल भी क्या महफ़िल हैं
जिसमे खुलते कभी हाथ नहीं 
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श्री गणेशाय नमः 

 करूँ प्रणाम मैं रणत भँवर को
सुनते हैं जो सबकी पुकार
एकदंत मोदक प्रिय मूषक वाहन
करें कल्याण
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 रिश्ता- ए -दोस्ती
ये दोस्ती नही आसां
बस इतना समझ लीजिये
एक
प्यारका रिश्ता हैं
और निभाते जाना हैं

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जल्दबाज लोग 
मुझे मेरे देश की जल्दबाजी
का पता तब चला
जब रेल के पायदान
पर
नीचे तक लटकते

लोगों में से
एक फिसल
कर गिर गया

उफ़! 
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प्रयासरत – विविधा 2013 की सम्पादकीय पंक्तियाँ
तुम संघर्ष करो भारत
युग में परिवर्तन आएगा
संकट चाहे कितने आयें
जो होगा देखा जायेगा 
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  अतिथि स्वागत-1
स्वागत में आपके हम मार्ग सजाने आए
हाथों में हम हमारे फूलों की माला लाये
विशिष्ट हो हमारे सम्माननीय तुम हो
तुम्हारे स्वागतम में पलकें विछा के आए 
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  अतिथि स्वागत-2

फूलों से कर रहे हैं स्वागत हम तुम्हारा
हमारे यहाँ पधारे अहसान है तुम्हारा
आप यहाँ पधारे महकी हमारी बगिया
आशीष से तुम्हारे कार्यक्रम सफल हमारा 

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विनय भारत
 

 


विनय भारत का हास्य व्यंग्य - एक कवि सम्मेलन में

हमारा कुलटा भाग्य कहें या सुलटा भाग्य कि हमें एक कवि सम्मेलन का स्नेह भरा आमंत्रण मिला। देखने में आमंत्रण कम किसी डाकू का ख्खत अधिक लगा। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे जिन्होंने उस आमंत्रण पत्र की भाषा को सुसज्जित किया। पत्र कुछ इस प्रकार था- कवि हम लोगों ने एक कवि सम्मेलन कराने का निर्णय किया है, आप पधारकर कविता पाठ करें।
पत्र को यदि ऐसे समझा जाए तो-

अरे ओ कवि, अपण ने तुम जैसा कवि लोगन कू सुणवा के लिए एक कवि सम्मेलन करवायो है जल्दी पधार जाइयो वरना मैं जाणत हूं तू रोज सब्जी लेवा बाजार जावे है… नी आयो तो किडनेप कर लूंगो। पत्र के नीचे सम्पूर्ण आयोजन समिति के सदस्यों के इतने नाम और दूरभाष थे कि कवियों की संख्या कम आयोजन समिति के सदस्य अधिक थे मानो हर कवि अपनी श्रद्धानुसार जो भी दान-पुण्य करेगा ये उसे मिल बांटकर खा-पी लेंगे।
जो सज्जन पत्र लेकर पधारे वे भी किसी डाकू से कम नही थे। पहले तो हम उन्हें देख घबराए एवं दौड़कर सीधे अंदर घुस गए हमें लगा कि ओसामा लादेन घर में घुस गया है। बाद में पता चला वे वीर रस के कवि थे। रचना के अनुसार उनका शरीर था मुझे सौ प्रतिशत विश्वास है कि इस शरीर के साथ कविता पाठ करते हुए इन सज्जन ने चार पांच मंच तो यूं ही तोड़ दिए होंगे। नाम भी बडा विचित्र था। टमटम भारीभरकम, खैर हमने आमंत्रण स्वीकार किया। भारी भरकम जी हमें आमंत्रण पत्र देकर गुजर गए। कवियों के लिए सुनहरी और श्रोताओं के लिए कत्ल की वह रात आ ही गई। रात आठ बजे कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। बेचारे बीवी की फटकार से परेशान तीन-चार सौ श्रोता कवियों से अपने दिमाग का मुण्डन संस्कार कराने आ ही पहुंचे। मंच के पास पंडाल लगा था और इस रात मंच पर अपना जलवा दिखाने वाले कवि कुर्सियों पर सजा सजाकर रखे हुए थे। एक दो कवि बंधु शरीर में इतना फैले हुए थे कि कुर्सियां और उनका शरीर आपस में कुश्ती कर रहे थे। अंततः उनके शरीर की जीत हुई अथक परिश्रम के बाद उनका पिछवाड़ा मासूम नवयौवना सी कुर्सी पर फंस चुका था। कवियों को काव्य संयोजक टमटम भारी भरकम जी ने मंच पर आमंत्रित किया। एक को छोड़कर सभी कवि मंच पर जा गिरे। शेष बचे हुए एक कवि बेचारी कुर्सी से अपना पिछवाड़ा छुडाने की कश्मकश में लगे रहे। आखिर कुर्सी ने उन्हे अपना मान लिया था अतः कुर्सी भी शरीर को पकड़ बैठी रही, चारों ओर हंसी का माहौल था। दो-चार कार्यकताओं ने कवि जी के पिछवाड़े से कुर्सी को खींचा, कुर्सी रानी ने भी थोड़ी देर ना-नुकुर करने के बाद कोप भवन छोड़ दिया। कुर्सी से पिछवाड़ा इतनी जोर से छूटा कि कवि जी सीधे मंच पर सष्टांग करते नजर आए। कवि जी से पूछने पर पता चला कि वे मंच पर चढने से पहले ऐसे ही प्रणाम करते हैं।
खैर, कवि सम्मेलन का प्रारंभ होने से पहले ही एक महा मुठभेड़ हो गई। दो कवि मंच संचालन करने के लिए आपस में भिड़ गए, अंत में शेष कवियों ने जय और वीरू की तरह सिक्का उछालकर और एक कवि को कवयित्री के पास बैठाने का लालच देकर जैसे-तैसे शांत किया। मंच संचालन करने की महा-मुठभेड़ में टमटम भारी भरकम जी वियजी रहे बडे अभियान से भरे हुए टमटम जी ने इस जीत को ईश्वर की कृपा, कविगणों का सहयोग, और श्रोता जनार्दन का आशीर्वाद बताते हुए स्वयं की जीत न बताते हुए जनता की जीत बताया। इसी जीत पर सभी कविगणों को उन्होनें पार्टी देने की घोषणा भी भरे मंच पर की। दरअसल संचालन करने वाले को अन्य कवियों से एक सौ एक रूपये अधिक मिलने वाले थे। खैर, भारी भरकम जी के रटे रटाए शब्द और कविताओं से कवि सम्मेलन की भूमिका बनी। बीच-बीच में टमटम जी बाबा आदम के जमाने के हसगुल्लों की बरसात श्रोताओं पर करने लगे लेकिन सुन-सुन कर पक चुके श्रोताओं ने इसे नकार दिया यहां तक कि संचालक जी के पैरो के पास अंडा और टमाटर आकर गिरा जिसे देखकर टमटम जी खीझ खीझकर श्रोताओं को तालियां बजाने के लिए बाध्य करने लगे। टमटम जी ने अपने संचालन में बडे-बडे साहित्यकारों और कवियों को याद किया ऐसा लगा मानो जयशंकर प्रसाद….. प्रेमचंद…. दुष्यंत…. परसाई…. अज्ञेय…. और निराला टमटम जी के लंगोटिया यार थे और इसी के साथ मानो महादेवी…मन्नु भण्डारी…सुभद्रा चौहान जी से इनका कॉलेज के जमाने का अफेयर चला हो। टमटम जी का वश ही नहीं चला अन्यथा वे भारतेन्दू को अपने चाचा का लड़का ही बता देते। खैर, कवि सम्मेलन का आगाज हुआ- पहले कवि युवा थे और रसराज श्रृगांर में डूबे थे। उनकी कविता में श्रृगांर के साथ-साथ प्रेम था उनके सुनाने की कला से प्रीत हेाता था कि वे पक्के दिल के मरीज थे और उनकी गर्लफ्रेंड उनको धोखा देकर पान वाले चौरसिया के साथ भाग गई थी इसलिए ये गीत लिखकर उन्होंने उसकी याद में कुंवारा ही मरने की भीष्म प्रतिज्ञा की है। कविता समाप्त हुई लोगों के दिल धड़के या दिल का अटेक हुआ ये तो वे ही जानें लेकिन तालियां बजनी थी सो बजती रही।

दूसरे अधेड़ उम्र के कवि थे पता चला वे भी श्रृगांर लिखते थे, युवा कवि के श्रृगांर लिखने का मतलब तो समझ में आता है लेकिन अधेड़ावस्था में श्रृगांर .. शायद भावी जी से सच्चा प्यार नहीं मिला था इसीलिए अब तक तलाश में थे लेकिन वे नही जानते थे कि हर काई अमिताभ नहीं है, खैर उन्होंने कविता शुरू की ….गीत सुनकर लगता था कि अवश्य ही भावी जी ने उन्हें प्रताड़नाऐं दी है उनकी कविता में भावी जी के अत्याचारों को सहने का दर्द था इसीलिए वे अपनी घरवाली से परेशान थे और कोई बाहरवाली ढूंढने की फिराक में थे, शायद इसीलिए वे कवि सम्मेमेलनों में आकर कवयित्रियों के बगल में मंच पर आसन ग्रहण करते थे। उनकी रचना चलती रही और वे पढते रहे… रचना में वे बाहरवाली को याद कर चिल्लाते रहे, बीच-बीच में कनखियों से पास बैठी कवयित्री को घूरते रहे, कवयित्री पर अपने नैनों से वाण चलाते रहे अंततः जन कवयित्री पर उनकी मोहमाया और कविता का नशा जब न चढ सका तब वे निराश होकर अपने स्थान पर आ बैठे। अगले कवि हम ही थे जैसे कुरबानी से पहले बकरे को खूब सजाया जाता है…वैसे हि संचालक ने अपने शब्दो से हमे पेड के झाड पर चढा दिया परिणामस्वरूप हम मंच पर जा टपके। मंच पर हमें देखकर लोगों की हंसी छूट गई कुछ लोगों का और भी कुछ छूट गया हो तो कह नहीं सकते। हम कुछ सुनाते उससे पहले ही माइक ने पीं……पां… सुनाना शुरू किया हमें लगा हमारे आने से माइक भी जोश में है। हम कविता सुनाने लगे लोगों कि तालियां नही बज रही थी शायद विरोधी पक्ष के कवियों ने लोगों के हाथों को बांध कर रखा था, हम भी कम नहीं थे, हमने तालियां बजवाने के लिए उन्हें ईश्वर का वास्ता दिया, कहते ही जो रही सही थी वे भी बंद हो गई। हमें ताली बजवानी थी हमने उन्हें उनकी गर्लफ्रेंड की कस्में दिलाई,कुछ लोगों के हाथ खुले हमें उम्मीद बंधी, हमने अचानक से उन्हें उनकी पत्नि के बेलन का भय दिखाया इतना सुनते ही श्रोताओं के मुख का रंग उड़ गया लेकिन भरे पांडाल में इतनी ताली बजी की हमारे जाने के बाद संचालक ने उन्हें बंद कराया।
हमारे बाद सिलसिला आगे बढाते हुए हास्य कवि चुन्नूलाल फोकटिया मंच पर कूद गए हंसगुल्ले बरसने लगे इसी बीच मंच पर हल्की-फुल्की सुगबुगाहट होने लगी,पूंछने पर पता चला कि कोई कवयित्री जी की मंच के नीचे से चप्पल उठा ले गया है अब कारण या तो ये रहा होगा कि चप्पल ले जाने वाला कवयित्री जी का कोई दिवाना रहा होगा या फिर बीबी के लिए चप्पल खरीदने के पैसे उसके पास न होंगे। खेर, इस दुःखद घटना पर सभी कवियों में शोक की लहर दौड़ गई। आखिर कवयित्री जी की चप्पल थी इसी बीच एक कवि ने इस घटना पर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपने की चेतावनी दी और संयोजक महादेव को दो चार गाली चालीसा के लम्बे-लम्बे पाठ सुनाए इस घटना पर सभी कवियों ने दो मिनिट का मौन रख कवयित्री को काव्यपाठ करने हेतु कहा। कवयित्री ने काव्यपाठ प्रारंभ किया उनकी कविता में चप्पल चोरी जाने का दुःख साफ झलक रहा था, कवयित्री अपने आंसुओं और वेदना को दबाकर बैठी रही हो सकता है वे चप्पल उन्हें अपने पति से भी प्यारी हो शायद इसीलिए काव्यपाठ करते हुए वे बार-बार मंच के इधर-उधर देखती रही और पास बैठे श्रोताओं के पैरो में खोजबीन करती रही।
जब पूरी कविता समाप्त होने तक भी वे अपनी चप्पलें नहीं खोज पाई तो मायूस होकर मंच पर आ बैठी। पास ही बैठे कवि उन्हें सांत्वना देने के बहाने उन्हें छूने का भरसक प्रयास करने लगे। एक दो अन्य कवि भी अब मंच पर माइक के सामने पहुंच गए उनमें से एक तो इतने पतले थे कि यदि वे माइक पकडकर नहीं रखते तो शायद पंखे की हवा का एक झोंका उन्हें उडा ले जाता, उनकी कविता भी उनकी तरत ही पतली थी, पतलू जी अपने शरीर के फायदे गिनाने लगे, हांलाकि शरीर का पतलापन स्पष्ट दिखता था कि भावीजी ने उनके शरीर को नरक जैसी प्रताडनाऐं दी थी यहां तक कि उनके सिर पर एक स्क्रेच का निशान था जिसे देखते ही पता चलता था कि भावी जी ने नारी अस्त्र बेलन का अच्छी तरह से और अपनी पूरी ताकत से प्रयोग किया था।

खैर, पतलू जी अपनी पतली कविता सुनाकर बैठे ही थे कि हवा के एक झोंके ने उन्हें तेज झटका लगा जिससे वे पास ही बैठी कवयित्री जी से टकराने बच गए और भंयकर दुर्घटना होते होते रह गई हालांकि पास ही बैठे कवि की भौंहे पतलू जी पर तन गई ऐसा लगा मानो पतलू जी यदि कवयित्री जी से टच जाते तो उनके पास बैठे कवि द्रोपदी रूपी कवयित्री की लाज बचाने हेतु भीम बनकर पतलू जी रूपी दुर्योधन से मंच पर ही महाभारत का घमासान शुरू कर देते।
इस महा एक्सिडेंट के बाद अंत में संचालक टमटम भारी भरकम अपने शब्दों के मायाजाल को वीर रस में पिरोकर मंच पर जा कूदे। मंच को टमटम भारी भरकम को देखकर ऐसा लगा मानो कुम्भकर्ण की बारी अब आई हो। जैसी वीर रस के कवि से मंच तोडने की आशा थी वह वैसी ही बनी रही। टमटम जी अपने पूरे दम से कविता सुनाने लगे। टमटम जी ने झांसी की रानी से लेकर गांधी जी तक सबको वीर रस में स्मरण किया मानो इन्हीं के आदेश से १८५७ की क्रांती लडी गई हो। टमटम जी ने वीर रस की कविता ऐसे प्रस्तुत की मानो अभी कश्मीर मुद्दे को हल करने के लिए सीधे कारगिल पर जाकर बैंठेगे। टमटम जी मंच पर धमाचौकडी मचाते रहे और उन्हें देखकर पीछे बैठे पतलू जी की हालत पतली होती रही हालांकि टमटम जी घर में पत्नि से डरते थे और मंच पर आदमखोर शेर की तरह उछलते थे।

अंततः कवि सम्मेलन का समापन किया गया। इसी बीच कवियों को लिफाफा देने हेतु बुलाया गया इसीलिए एक दो कवि मंच से कूद पडे और अपने कुरते को मंच की टेबिल पर निकली कील से उखड़वा बैठे कवयित्री जी को संचालक ने अपने जूते उपहार स्वरूप भेंट किए और उनकी दो सौ रूपये की चप्पल के लिए कवियों के लिफाफे से तीस-तीस रूपये की कटौती कर ली गई जिसके कारण संचालक महादेव को दो-चार गाली पाठ फ्री में सुनने को मिला। इसी के साथ सूत जी ने कथा कहना बंद कर दिया।
बोलिए आज के आनंद की जय और कवियों के संसार को भय………

KAVI-
विनय भारत

विनय भारत का हास्य व्यंग्य-‘‘वैशाख का सूरज”

गधा अर्थात्‌ वैशाखनंदन या यूं कहें तो वैशाख का चमकीला सूरज, ऋतुप्रेमी, सीधा साधा मूक सा जानवर।
गधे की जितनी प्रशंसा करें उतना कम। जब भी गर्मी का मौसम हो और जोरदार शंखनाद जैसा क्रमशः साउण्‍ड सुनाई दे जिससे कान के सभी वाद्ययंत्र बजने लगे तो समझिए वैशाखनंदन महोदय आस-पास हैं। प्रकृति ने यदि कोई निरा भोला जानवर बनाया है तो वह है गधा। गधे का स्‍वभाव सरल होता है, इसकी सरलता का पता इस बात से लगता है कि गाँव के बच्‍चे कभी इसके कान मोड़ते हैं तो कभी कोई पीठ पर चढ़कर अश्व आरोहण का सुख प्राप्‍त करते हैं। लेकिन यह सरलबुद्धि जीव सभी को समान भाव से देखता है। वहीं दूसरी ओर घोड़ा हमारे भ्रष्‍ट नेताओं की तरह अड़ियल होता है, जब तक चने की दाल रिश्वत में ना लें, तब तक अड़ा रहता है और कोई कार्य नहीं करता। लेकिन परम दयालु और कृपालु जानवर गधा भूखा रहकर भी काम पर निकल जाता है। मैं ये कहता हूं कि जिसने जीवन में वैशाखनंदन की पीठ-यात्रा नहीं की तो क्‍या फायदा जीने का, उसने उसी प्रकार से यह सुअवसर खो दिया जैसे किसी ठेकेदार से कोई सड़क निर्माण का ठेका मिलते-मिलते हाथ से निकल गया हो।
वर्तमान में इस परम निराले पशु के साथ उसी प्रकार से अन्‍याय किया जा रहा है जैसे भ्रष्‍ट नेता पर ईमानदारी का आरोप लगाया जा रहा हो। किसी की शादी में जाना हो तो घोड़ा याद आता है, किसी को रथ यात्रा करनी हो तो घोड़ों को याद किया जाता है। गधे की जिंदगी ऐसी है जैसे कार्यालयों में गरीब व्‍यक्‍ति द्वारा रिश्‍वत देकर भी काम न बने और वो ऑफिसों में अपनी चप्‍पलें चमकाता रहे।
घोड़ों को छोड़ श्‍वान पर आते हैं। श्‍वान के वर्तमान में पॉचों पंजे घी में और सर कड़ाही में है। जिन लड़कियों की झलक पाने के लिए हजारों लीटर पेट्रोल फूंका जाता है, उन्‍हीं लड़कियों के पास श्‍वान नामक जीव बड़े सम्‍मान के साथ बैठता है। ऐसे में गधा मानवों से श्रेष्‍ठ है। उसके साथ अन्‍याय करना गलत है। मानव गधों का चारा डकार जाता है लेकिन गधा कभी मानव के भोजन पर नजर नहीं डालता। गधा ऐसा जीव है जो भोजन करके सिंहनाद करता है और ईश्वर को चिल्‍ला-चिल्‍लाकर भोजन के लिए धन्‍यवाद देता है, जबकि मानव ईश्वर को केवल संकटों में याद करता है। वैशाख शुरू होते ही यह नाचना शुरू कर देता है जबकि मानव चुनाव के दिनों में ही नाचता है। गधे की दुलत्ती बड़ी कष्‍टप्रद होती है। ये उन मानवों के लिए है जो चुनाव के दिनों में हाथ जोड़ता है और चुनाव के बाद बड़े-बड़े घोटाले करता है, पेट्रोल, गैस पर पांच रूपये से पच्‍चीस रूपये तक बढ़ाता है लेकिन जनता के आक्रोश पर मात्र सत्‍तर पैसे कम करता है। ऐसे सेवाभावी मानवों का स्‍वागत गधे की लात से होना चाहिए।
वर्तमान में ऐसे भ्रष्‍ट नेताओं का स्‍वागत जगह-जगह फूल मालाऐं डालकर किया जाता है। इनका स्‍वागत करने की अपेक्षा यदि उस सरल जीव गधे का स्‍वागत दो पुष्‍प चढ़ाकर किया जाये तो अच्‍छा है। गधा हमें कुछ लाभ तो देता है और नोट-वोट की राजनीति से भी दूर रहता है। खैर! हम तो लेखक है, ऐसे ही कलम घसीटते रहते हैं। लेकिन ये जानकर कभी-कभी प्रसन्‍नता होती है कि अभी कुछ लोग सजग हैं, जो फूल मालाओं की जगह थप्‍पड़, चप्‍पल, जूते का प्रयोग कर रहे हैं। असली फूलों के हकदार और दबंग पुरुष तो वे ही हैं जो गधे और भ्रष्ट नेता में अंतर समझकर अपनी वीरता हाथ-पैरों से प्रदर्शित कर रहे हैं।
॥जय हिन्‍द जय भारत॥
लेखक
विनय ‘भारत’

विनय भारत का हास्य व्यंग्य- फेल होने के फायदे

फेल होना एक कला है, फेल होना कोई आसान काम थोडे ही है, फेल होने के लिए अपने मन को मनाना पड़ता है हम रोजाना किताबों के दर्शन करें और मन के बार-बार ‘‘पढ़ले-पढ़ले” कहने पर भी न पढें किताबों को छुऐं भी नहीं, यह बड़ा मुश्‍किल काम है। अब तक जो लोग फेल होने के फायदे नहीं नहीं जानते थे वे लोग भी क्‍या जाने कि फेल होने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते है․․․․ फेल होने के लिए उत्तरपुस्‍तिका को खाली छोड़ना पड़ता है․․․․ किताबों को पेटी में ताला लगाकर चाबी बाहर कहीं नदी-नाले में फेंकनी पड़ती हैं तब जाकर कहीं फेल होने का महा अभियान शुरू होता हैं। फेल होने में जोखिम भी है यदि किसी घर-परिवार के व्‍यक्‍ति को हमारे प्‍लान का पता लग गया तो गई भैंस पानी में․․․ फिर तो डर के मारे पढ़ना पढे़ और पास होना पड़े। स्‍कूल के बहाने बनाकर अनुपस्‍थित रहने की योजना पर पानी न फिर जाए इसकी भी सावधानी रखनी पड़ती है यानि कि हर तरफ से खतरा ही खतरा․․․․। फिर भी धन्‍य हैं वे लोग जो इतने खतरे उठाने के बाद फेल हो जाते हैं।
दरअसल ऐसे लोग जो फेल होते हैं ऐसे बंदों को भगवान सोच-समझकर बडे ही आलस से बनाता है। इसका कारण है कि जो फेल होता है वो भगवान को ज्‍यादा याद करता है। अतः भगवान ने परेशान होकर ऐसे बंदे बनाना छोड़ दिया रही सही कसर सरकार ने पूरी कर दी कि आठवीं तक कोई फेल न हो। इसके बाद भी यदि कोई विद्यार्थी कक्षा आठ में खाली कॉपी देकर फेल करने के लिए परीक्षक को चैलेंज देता है तो ऐसे महापुरूष को तो मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ क्‍योंकि वही एक ऐसा विद्यार्थी था जिसने फैलियर वर्ग की नाक कटने से बचा ली, आखिर ऐसे लोग कम ही होते हैं जो दूसरों की शान बचाने के लिए अपने एक साल का बलिदान कर देते हैं ये तो लोगों की ही नासमझी है कि ऐसे विद्यार्थी को वे गाली या भला बुरा कहते हैं उसकी बलिदान की पीछे की भावना को नहीं समझते है।
दरअसल फेल होने के अनेक फायदे है, फेल होने वाला विद्यार्थी अपने जूनियर से कम्‍पीटीशन में आगे रहता है क्‍योंकि जूनियर तो पहली बार ही नया कोर्स पढ़ रहा है लेकिन फैलियर का रिवीजन हो जाता है वह क्‍लास में सबसे होशियार और अच्‍छे अंकों से पास होता हैं इसलिए एक ही क्‍लास में जितनी बार फेल हों उतना ही अच्‍छा है एक दिन ऐसा आयेगा कि आप बार-बार उसी सिलेबस को पढ़-पढ़कर मैरिट में आऐंगे, वो कहावत तो सुनी होगी करत-करत अभ्‍यास के․․․․
दूसरा फायदा ये है कि यदि आप सह शिक्षा वाले संस्‍थान (लडके-लडकियों की एक साथ शिक्षा) में पढ़ रहे हैं तो फिर तो आपको आपकी जूनियर गर्लफ्रेंड के साथ एक ही क्‍लास में देर तक बैठने का मोैका मिलता है आप उसे ये भी कह सकते हैं कि आप केवल उसी के लिए फेल हुए हैं․․․․ इम्‍प्रेशन अच्‍छा जमेगा। यदि आप किसी बोर्ड कक्षा में फेल हो जाते हैं तो इसके तो विशेष फायदे है या तो घरवाले आपकी पढ़ाई छुड़ा देंगे आपकी पढ़ाई की तकलीफ खत्‍म हो जाएगी अन्‍यथा यदि दोबारा पढ़ने को कहेंगे तो उन्‍हें आपसे अच्‍छे अंक लाने की उम्‍मीद खत्‍म हो जाएगी फिर आप कम पढाई करके पास हो सकते है।
मैं तो कहता हूँ कि हर क्‍लास में फेल होते रहिए ताकि प्रिंसिपल भी आपकी इस कला की दाद देने लगे आखिर ये कला हर किसी में थोडे ही हाती हैं। यदि अब भी किसी को फेल होने की तरकीब नहीं सूझ रही हो तो मुझसे फेल होने की कोचिंग ले सकते हैं। फीस भी बहुत कम है जल्‍दी पधारकर अपना स्‍थान रिजर्व करें क्‍यूंकि लेख लिखने से पहले ही पचास-साठ हजार सीटें बुक हो चुकी हैं स्‍थान कम ही बचे हैं एक बार फेल होकर तो देखिए․․․․ अच्‍छा लगता है।

विनय भारत का हास्य व्यंग्य- ‘‘हम ईमान बेचते हैं”

‘‘हम ईमान बेचते हैं”
जी हाँ ,आपके कान गलत नहीं सुन रहे हैं यदि आपको विश्‍वास नहीं हैं तो आपकी कसम, हम वास्‍तव में बेचते हैं। क्‍या कहा… सुनाई नहीं दिया……. अरे! ईमान बेचते हैं और क्‍या….? अब भी नहीं सुन सकते तो तुम्‍हारा….सिर। हाँ अब सुन लिया…. तो बताइये क्‍या भाव लगाया है आपने हमारे ईमान का? क्‍या….अच्‍छा…..भाव…भाव जो आप चाहें…..विश्‍वास नहीं हो रहा हैं तो एक बार हमारे ऑफिस आइये…. आपका कोई काम लाईये….. फिर हम बताऐंगे कि हम सफेद कुर्ता पजामा यूँ ही नहीं पहनते। इसके नीचे मोटी तोंद और मोटे हाथ-पैर और मोटी चमडी ऐसे ही ईमानदारी से नहीं बनाई है… सब दो नम्‍बर की माया हैं… सिर पर सफेद टोपी पहनते हैं ताकि हमारा दिमाग कोई चुरा न ले। यदि चाहें तो आजमाकर देख लीजिये…. कसम से। झूठ नहीं बोलते जिंदगी में दो बार झूठ बोला था। पहली बार जब जनता के घर पर हाथ जोड़कर गये थे तब और दूसरी बार शपथ लेते समय। अजी…जनाब भगवान कौन है… कोई नहीं। उसकी कसम की कोई कीमत नहीं। हमें क्‍या करना है उस पत्‍थर से। और भई…फिर वह ईश्‍वर खुद बिक जाता हैं…मूर्ति के रूप में तो फिर हम अपना ईमान क्‍यों न बेचें। अब खरीदना हो तो आ जाईये..। क्‍या…. पता पूँछ रहे हो…. ऐसी बात है भाई मेरा एक घर तो है नहीं जैसे श्रीकृष्‍ण गीता में कहते हैं मैं ही नर हूँ और मैं ही नारायण। उसी प्रकार मैं कहता हूँ मैं ही नेता हूँ, मैं ही अधिकारी, मैं ईश्‍वर की तरह कण-कण में तो नहीं हूं लेकिन हाँ… हर सरकारी ऑफिस में अवश्‍य मिलूँगा। मैंने मीडिया से बचने हेतु हॉस्‍पीटल में तख्‍ती लटकाई हैं जिस पर लिख दिया …. यहाँ भ्रूण हत्‍या या जांच निषेध है… पर आप जानते हैं सबसे बड़ा रूपैया!
मेरे पास आईये। मैं बैंक में उपलब्‍ध हूँ। आप मुझे पोस्‍ट ऑफिस, पंचायत समिति, अस्‍पताल, शिक्षा विभाग आदि में खोज सकते हैं। प्रायः मेरा मुख्‍य विभाग राज्‍य स्‍तर तथा राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बडे मंत्री नेताओं के निवास स्‍थान पर हैं, पर आप मुझे बिजली विभाग में अधिकांशतः प्राप्‍त कर सकते हैं।
आप निराश न हो… मुझे आपका ये निराश चेहरा पसंद नहीं। आप चाहें तो आपका चेहरा बदलवा दूँ। लेकिन आप अब परिचित हो गये हैं औरों से पाँच लाख लेता हूँ, आप दो ही दे दीजिये। सब चलता है…, अच्‍छा बाबा आपका चैक क्‍लीयर हो जाएगा…. आपकी परीक्षा पास ही समझिए…. आपकी नौकरी पक्‍की ….. अरे लड़का ही होगा… आपकी पेंशन चालू… आपका ट्रांसफर रूक जायेगा… नो चिन्‍ता नो फिकर आप जेल से छूट जायेंगे…. आप केस जीतेंगे…. टेंडर आपको ही मिलेगा… जज को छोडिये मेरा ही ससुर है…. उसकी ऐसी….. उसकी तैसी…. कौन क्‍या कर लेगा… चिन्‍ता छोडिये…. देख लेंगे ये ईनाम आपको ही मिलेगा…. मुबारक हो समझिये आप बी.पी.एल. में आ गए… कल के अखबार में आपकी दूसरी मैरिट… सत्रांक पूरे पचास ….. साहित्‍य पुरस्‍कार आपको मिलेगा…. बस दो पेटी लगेंगे…. हो जाएगा… हो जाएगा… हो जाएगा।
बस थक गये, क्‍या मेरे और कारनामे सुनना चाहेंगे…. कि ईमान के साथ मैं चारा….. राशन का गेहूँ….चीनी भी बेच देता हूँ। क्‍या आप अब तक ये जान पाए कि मैं हूँ कौन। चलिये छोडिये फिर कभी जानना… तब तक के लिए जय हिन्‍द।

विनय भारत का हास्य व्यंग्य - स्कूल बैग की व्यथा

मैं हूँ बैग, आपने रोज मुझे सड़कों पर आते-जाते बच्‍चों के कंधों पर लटका देखा होगा। मेरी जिन्‍दगी की कहानी बड़ी दुखभरी हैं। मैं सुबह जल्‍दी उठता हूँ और रात भर देर तक जागता हूँ । कभी-कभी तो बच्‍चे मुझे तकिया बना लेते हैं। रोजाना छः बजे उठकर किसी के कंधे पर लटककर चलना, रात को उपेक्षित सा पड़ा रहना मुझे बुरा लगता हैं। जब बच्‍चे सुबह-सुबह ढेरों कॉपी-किताब भरकर कंधे पर लटकाते हैं तो मुझे उनकी पीठ से चुभन होती हैं, उनके उठते कंधे के दर्द से बैचेनी अनुभव करता हूँ। दर्द उन्‍हें होता हैं और हिलाते-डुलाते मुझे हैं। पुस्‍तकों के ढ़ेर से बच्‍चे परेशान होकर मुझे कोहनी तक मार देते हैं। मेरे वजन के बोझ से वे तो पैन किलर लेकर दर्द दूर कर लेते हैं, लेकिन मैं तो ये भी नहीं कर सकता।
बच्‍चे विद्यालय जाते हैं, उन पर जब मैं नहीं उठता हूँ तो उनके रिश्‍तेदार या माता-पिता मुझे लटकाकर ले जाते हैं। कभी-कभी तो दुःखी बच्‍चे मुझे उतारकर फेंक देते हैं जिससे मेरे कपड़े छिल जाते हैं। सुबह उठकर मुझे सभी की मनहूस गालियाँ तक सुननी पड़ती हैं। अध्‍यापकों तथा शिक्षाविभाग द्वारा निर्धारित कोर्स बच्‍चे मेरे अंदर रखकर विद्यालय जाते हैं, परेशान होते हैं और गालियाँ मुझे पड़ती हैं।
बच्‍चे मुझे हेय दृष्‍टि से देखते हैं, परिवार के लोगों का कोप मुझ पर बरसता हैं। इतना भी हो तो बस․․․․․। लेकिन बच्‍चे जब मुझे फाडकर नष्‍ट कर देते हैं तो वे बाजार से नया मंहगा बैग फिर खरीद लाते हैं। खर्चा परिवार का होता हैं, बच्‍चों की जिद होती हैं लेकिन मेरा दोष तनिक मात्र भी न होने पर डाँट मुझे ही पड़ती हैं, नाम मेरा ही आता हैं। मेरे अन्‍दर पड़ी पुस्‍तकों को कोई कुछ नहीं कहता, शिक्षा विभाग को कोई कुछ नहीं कहता। मुझे तो ये समझ नहीं आता कि क्‍या शिक्षा विभाग में निर्धारित पुस्‍तकों का निर्णय करने वाले अधिकारीगणों के बच्‍चे शिक्षा के इस बोझ तले नहीं दबते हैं क्‍या उनके बच्‍चों के हाथ-पैर मशीनी हैं।
लेकिन ․․․․․․․․ मैं अपनी व्‍यथा किससे कहूँ? मजबूर हूँ मानव के अत्‍याचारों को सह रहा हूँ, आप तक बात पहुँचाना चाहता था जो पहुँचा दी․․․․․․․․।
आगे आपकी मर्जी, अपुन को तो बस सहन करने की आदत सी पड गयी हैं।

विनय भारत का हास्य व्यंग्य - बोरियत जिन्दाबाद

बोरियत ………… बोरियत………. बोरियत……….. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इस बोरियत नामक शब्‍द को जीरो से गुणा कर दूं। पर फिर सोचता हूं कि ये काम भी तो ऊबीला है। बोरियत सभी को होती है, कारण है कि हम फालतू होते हैं तो सभी को फालतू समझते हैं। इस बोरियत से बोर होकर मैंने भी कुछ करने को सोचा। एक सब्‍जी वाले के पास गया, मैंने कहा कि आलू है क्‍या? वो बोला नहीं, ये बैंगन ले जाइये। मैंने कहा, जब आलू ही नहीं है तो बैंगन का क्‍या करूंगा? वो बोला, बैंगन ले जाइये, घर जाकर सब्‍जी बनाइये, पसंद ना आने पर रोटी के साथ सब्‍जी दे जाइये।
पहले ही सब्‍जी खरीदने का बोरियत सा काम कर रहा था, इसके बाद फेसबुक चलाने बैठा, वहां देखा कि कुछ मस्‍तीली लड़कियों की फोटो, कुछ हंसीले चित्र, कुछ पगलू से कमेंट पड़े हुए थे। उन्‍हें देखकर फिर बोर हो गया, फेसबुक पर भी कुछ खास नहीं किया जा सकता। पर क्‍या करें, टाईम पास तो करना था, सो कुछ कोल्‍ड ड्रिंक लाया, उसमें कुछ नमक मिलाया और पी गया। कुछ देर बाद नींद लग गई। हीरोईनों के सपनों में खो गया….. कभी उहलाला……….. तो कभी मैं लाला, कभी मुन्‍नी बदनाम…… तो कभी शीला जवान… अब तो छोकरा भी जवान हो गया, छोकरा सपने में आते ही नींद खुल गई, क्‍योंकि ऐसा लगा कि इससे अच्‍छा तो कोई भूतनी देखे लेते, कम से कम फीमेल तो होती, अब गुस्‍सा आया तो कुछ लिखने बैठ गया। ऐसा लिखा, ऐसा लिखा कि क्‍या कहूं, अब जो लिखा वो तो आप पढ़ रहे हैं, पढ़कर बोर हो रहे हैं, मुझे भी पता है कि आप मुझे गाली देंगे, लेकिन ये भी बोरियत का एक काम है।
मैंने नल से पानी भरा, नल में से एक सॉप निकला, लेकिन मुझे डसा नहीं। मैंने पूछा कि अबे डँसता क्‍यों नहीं, वो बोला कि आज के जमाने में इन्‍सान ही इन्‍सान को ड़स रहा है तो फिर मैं अपना जहर क्‍यों बर्बाद करूं।
अब तो बहुत ही ज्‍यादा बोरियत की हद हो गई थी। वैसे बोर होना भी एक काम है, क्‍योंकि बोर होने के लिए आपके पास समय होना चाहिए, आपका दिमाग शैतान का घर यानी खाली होना चाहिये, तब जाकर कुछ बोरियत के लम्‍हे बड़ी कठिनाई से मिलते हैं। बोर होते-होते पास के मैदान में गया, वहॉ देखा, कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे थे तो कुछ फुटबाल। क्रिकेट भी अब फालतू हो गया है। देखने बैठे तो कोई गेंद फेंक रहा है, कोई बैट उठा रहा है। ऐसा लगा कि किसी विशेष महायुद्ध की तैयारी हो रही हो और बॉलर गेंद की जगह बम फेंक रहे हो तथा सामने शत्रु सेना बैट रूपी ढ़ाल लेकर खड़ी हो और बम को बीच रास्‍ते पर ही दूसरी ओर उछाल रही हो। स्‍टम्‍प जैसे किसी राजा का महल हो, जिसको बचाने के लिए एक महायुद्ध बड़े पैमाने पर चल रहा हो और बेचारे दो बेट्‌समैन अकेले ही गुरू गोविन्‍दसिंह के सवा लाख से एक लड़ाउं वाले नारे को सिद्ध कर रहे हैं।
कुछ खास ना लगा, लेकिन फिर नींद आ गई। आखिर हम भी पक्‍के निंदोकड़े थे। इस बार देवलोक देख रहे थे। सामने देवराज इन्‍द्र का आसन, पास में एरावत हाथी और दरबार में मैनका आदि के नृत्‍य देखकर ऐसा लगा जैसे पृथ्‍वी के किसी डिस्‍कोबार का दृश्य सामने आ गया। पर आश्चर्य होता है स्‍वर्ग की कार्यप्रणाली देखकर कि मनुष्‍य यदि बार में जाकर नाचे, शराब का सेवन करे तो पाप है लेकिन देवता लोग रम्‍भा आदि का नृत्‍य देखें और मस्‍ती करें, ये पुण्‍य है। पर देवलोक से हमें क्‍या मतलब, उनकी लीला वे जानें, अतः नींद खुल गई, क्‍योंकि मेनका के नृत्‍य के बाद वरूण देव नृत्‍य करने लगे। हम बोर होते-होते कुछ लिखने बैठ गये।
खैर! बोरियत महसूस कर रहा था, मैंने सोचा कि मैं अकेला ही बोर क्‍यों हूं और सभी क्‍यों बोर नहीं है? इसलिए ये लेख लिखा ताकि आप भी इस बोरियत का फायदा नुकसान देख सकें। इस लेख को बार-बार पढ़कर बोर होइये, सिर खपाइये और ज्‍यादा गुस्‍सा आये तो खोपड़ी दीवार पे दे मारिये। आपकी टेन्शन खत्‍म और आपको देखकर यमराज की टेन्शन शुरू। सब टेन्शन ही खत्‍म, फिर भी कुछ न हो तो मुझसे कहिये, ऐसे दो-पॉच लेख और भेज देता हूं। कसम से ……. दोबारा बोर होने की कोशिश नहीं करेंगे

विनय भारत का हास्य व्यंग्य - मेरी शादी का कार्ड

मेरी शादी का कार्ड – ( हास्य व्यंग्य)
बुलाता हूँ मैं उन गणपति जी को
जो करते हैं सभी का कल्‍याण!
आयें गणपति हमारी इस शादी में,
सभी देवों के साथ!
सभी को दर्शन दे जायें गणपति,
आकर के इस बार!
हमारी शादी का तो हो जाये बहाना,
शादी में आने वालों का हो जाये उद्धार!
शादियों का दौर अभी चल रहा हैं इसी चलते दौर में हमने भी शादी करने का विचार किया। इस विचार के चलते कन्‍या की तलाश शुरू हुई वैसे मुझसे तो कोई शादी नहीं करती लेकिन एक सुन्‍दर कन्‍या राजी हो गई। वैसे तो शादी करके आप सभी पछता रहे होंगे पर मुझे पता है कि आप मुझे नहीं रोकेंगे क्‍योंकि मेरी शादी का कार्ड हाथ में आते ही आप सर्वप्रथम प्रतिभोज की दिनांक और समय देखेंगे कि भोजन के लिए कहाँ और कब जाना हैं। समय का तो मेरा भारत इतना पाबन्‍द है कि चाहे कितनी ही अर्जेन्‍ट मीटिंग हो लेट पहुंचेंगे। लेकिन जहाँ खाने की बात आयी वहाँ समय से पहले पहुँचकर व्‍यवस्‍था बिगाडेंगे। भोजन खाते तो आप कम हैं और बिगाड़ते ज्‍यादा हैं, उल्‍टा सीधा एक साथ ठूँसकर पेट खराब करते हो। फिर सीधा डॉक्‍टर के पास जाते हो, हमारा माल भी खराब हो और आपका पैसा भी खराब हो। ये सब देखते हुए मैनें प्रीतिभोज का कार्यक्रम ही लिस्‍ट से हटा दिया हैं। मेरे देश के भूखों, चिन्‍ता मत करों, भोजन तो होगा लेकिन कुछ हट के।
बुफे तो होगा लेकिन बुफे में केवल पूरियाँ और दाल होगी, साथ में नमक होगा। पानी पीकर आये क्‍योंकि मैं मुख्‍यमंत्रीजी के नारे पर अमल कर रहा हूँ पानी बचाओ।
कॉफी, चाय का इंतजाम नहीं हैं क्‍योंकि मैं आपके फेफड़ों का हितैषी हूँ। मिठाई में लड्‌डू होगें वो भी केवल मोतीचूर के क्‍योंकि मेरी शादी में गणेशजी देव गणों के साथ सपरिवार आ रहे हैं और गणेशजी को मोदक पसंद हैं। यदि मोदक नहीं रखा तो गणेशजी के नाराज होने पर मेरी शादी रूक सकती है। इसलिए शेष मिठाइयाँ न रखना मेरी मजबूरी है। जैक-चैक से होने वाली इस शादी को मैं तोडना नहीं चाहता।
मेरी शादी में केवल एकबार प्रीतिभोज होगा और वो भी तब जब मेरे सातों फेरे हो जायेंगे। मैं भूखा-प्‍यासा बैठकर फेरे लूँ और आप सभी खा-पीकर ;क्षमा करें पीकर तो आप घर से ही आयेंगे, मेरे लिए भी एक बिसलेरी की बोतल लेते आना घर बैठे और गर्मी हो या सर्दी मैं ही मरूँ। इसलिए फेरों के बाद सभी साथ में प्रीतिभोज करेंगे। कोई भी भोजन खाये बिना न जाये। सभी मेरी शादी में आने से पहले 151 रूपये पुत्रदान की राशि लेकर आयें क्‍योंकि दहेज कम आ रहा है। आप मुँह दिखाई की राशि में टी.वी., फ्रिज, डबलबैड, वाशिंग मशीन आदि बड़े-बड़े आईटम दे, शेष सामान बेटी वाले दे रहे हैं।
बारात में सभी को चलना हैं, अपनी-अपनी गाडी करके लायें क्‍योंकि मैं भी किसी जीप से लटक कर जा रहा हूँ, मेरे भरोसे ना रहें।
शेष कार्यक्रम निम्‍न हैः-
महिला संगीत- बिना डीजे के होगा मुझे ध्‍वनि प्रदूषण पसंद नहीं।
चाक- चाक का कार्यक्रम सभी अपने-अपने घर पर करें।
भात- सभी भारतीय औरतें हमारी माँ के समान हैं और उनके भाई हमारे मामा हैं अतः 50-60 हजार का भात लेकर सभी मामा पधारें।
नोटः- बारात रात 12 बजकर 12 मिनट 12 सैकेण्‍ड पर चांदनी बीयरबार से सूरज ठेका देशी शराब व भांग तक जायेगी।
विशेष अनुरोध- सभी इस कार्ड के 50 रूपये अतिरिक्‍त लेकर आये कोई डिस्‍काउन्‍ट नही।
आपका अपना दूल्‍हा
बल्‍लू बजेला
और मेरी दुल्‍हन
चम्‍पा चमेली
प्रार्थी व अभिलाषी जीजा-जीजी
समस्‍त बदनाम व देशभक्‍त परिवार कल्‍ली कार्टून-सल्‍लू सीलेली
चाचा-चाची ताऊ-ताई
पप्‍पू कटेला-गप्‍पी बदनाम गंजा घनचक्‍कर-बुढिया दीवानी
लेखक-
विनय भारत
कवि एवं साहित्यकार
व्याख्याता
श्री परशुराम शास्त्री संस्कृत महाविद्यालय गंगापुर

विनय भारत का हास्य व्यंग्य - इट्स ऐंन्टरटेन्मेंट

नीरज यानि ‘कमल’ और कमल कीचड में ही खिलता हैं ! ‘कीचड’ से याद आया कीचड हमारे घर के सामने वाले रास्ते पर बहुत रह्ता है और ‘रास्ता’ तो कोई झाडता नहीं झाडने से याद आया ‘झाडू’ …. और झाडू से याद आये श्री श्री झाडचंद महाराज ‘केजरीवाल’
और हां … ‘वाल’ से याद आया आजकल मेरे ‘बाल’ बहुत झडने लगे हैं वो हुआ ऐसा कि भइ, पूरा भारत स्वच्छ भारत अभियान मे लगा हुआ है तो मैंने भी सोंचा कि हमें भी अपने आप को साफ करना चाहिये क्योंकि हम भी 15 दिन से नहीं नहाये थे , सो हमने एक ब्रांडेड कंपनी का ‘’प्लस माइनस’’ शैम्पू लगाया ,और होना क्या था भई कंपनीवालों की बात सच निकली.. शैम्पू लगाते ही बाल पानी के साथ साथ ही बह गये ! ‘बह्ने’ से याद आया पिछ्ले ‘नीलोफर तूफान’ में हमारी ‘अनामिका’ बह गयी. क्या कहा अनामिका…अनामिका..हमारी ‘भैंसिया’ है ! अब भई, तूफान का नाम नीलोफर हो सकता है ,कुत्तेका नाम ‘ऐंटरटेन्मेंट’ हो सकता है ,तो हमारी भैंसिया का नाम अनामिका नहीं हो सकता..हम कौन अक्षय कुमार से कम हैं ! अक्षय कुमार की एक बात समझ नही आई ..कभी कहता है ‘’इश्क कुत्ता है’’ ..कभी कहता है ‘’कुत्ता ऐंटरटेन्मेंट है’’ भई, एक बार डिसाइड कर लो कुत्ता इश्क है या ‘ऐंटरटेन्मेंट’! कुत्ते से याद आया पडौसी जो बार-बार अपनी हद भूल जाता है,और हद हमारे जीजाजी बहुत करते हैं ह्द करने में वे इमरान हाश्मी को भी मात देते हैं खैर, ये अंदर की बात है! जीजाजी से याद आया कल हम जीजजी का ए.टी.एम. चुरा लाए, कोड नंबर ह्मे पह्ले से ही पता है !चोरी से याद आया रात को हमारे मित्र के घर चोर घुस गये …मित्र टोयलेट के लिये उठे थे ..देखा टोयलेट ही टूटा पडा है, बेचारे को तेज़ लगी थी वैसे तो वे चोरों को छोड देते लेकिन टोयलेट तोडा था सो वे भी उन्हे तोडते रहे ..और इतना तोडा कि जेल जाने से पहले चोरों को टोयलेट बनवाने का ठेकादेना पडा! ठेके से याद आया आज देशीठर्रा पीना है विदेशी अपुन के पचता नहीं, और पीने से याद आया आजकल नलों में पानी खूब आ रहा है,लेकिन आंखों का पानी कम पडता जा रहा है … खैर, पानी पीना जुर्म नहीं हैं किसी को पानी पिला देना या पानी फेर देना जुर्म है..जुर्म एक कीचड है … और कीचड में कमल है… कमल भाजपा है …भाजपा मोदी है, मोदी केंद्र है ,केंद्र में नौकरी पर सालभर का वैन है, राज्य वसुंधरा है और नौकरी के कोइ चांस नहीं है..इसलिए पढे लिखे युवा बेरोजगारी कीचड है.. कीचड रास्ते में है …रास्ता कोई झाडता नहीं …झाडू केजरीबाल की है …बाल हमारे सिर पर नहीं है..बह गये..हमारी भैंसिया अनामिका बह गई..हाय राम…नीलोफरतूफान है …कुत्ता अक्षय है..मेरा मतलब अक्षय कुमार का इश्क है…कुत्ते से याद आया पडौसी..वो मांगे कश्मीर …उसे मिलेगा बाबाजी का ठुल्लू…बगैरा…बगैरा..
बस भइ बस और कितना पढोगे ..भइ अब तक पके नही आप …जहां से शुरू किया था वहीं वापस आ गए …यही तो है शब्दों की भूल भुलैया..अब ये मत पूंछ्ना कि इसे क्या कहते है कयुंकि इसे कह्ते हैं हिपहोपहिपहोप …और ये मेरा अगले आर्टीकल का टाइटल है… अगैरा…बगैरा..जो इसे पढ्कर नहीं हंसा उसके घर में आज रात घुसेगा बघैरा..ह..हा

Monday, 24 August 2015

कुछ हास्य कविताएं -भाग - 1- विनय भारत

शोपिंग


एक शोपिंग माल में हमें प्यार हो गया
यूँ हीं आते जाते इकरारहो गया
शोपिंग की लत इतनी थी उन्हे क्या बताऊँ यार
शोपिंग कराके प्यार में
कंगाल हो गया

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बूढ़े का वेलेंटाइन 


एक बूढ़ा देख एक हसीना को बोला यूँ
नीली आँखों वाली कभी इश्क तो लडाइये
तुम्हारी अदाओं का मैं दीवाना सा बन गया हूँ
आकर के कभी हमसे नैन तो मिलाइये

बोली हसीना देख हड्डियों के ढांचे को
नसों में गुल्कोज की बोतल चढवाइये
और

फोड़ नहीं सकते जो चना कभी दाँतों से
फिर

अखरोट फोडने की बात ना चलाइये
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 एक रेल में 

रेल में वे बोले
स्फूर्ति और रफ्तार शरीर में जगाइये
हमारी वस्तु लीजिए और थकान मिटाइये
भरी भीड़ में अलग चमकेंगे आप
ऐसा जोश पाइये
मैंने कहा –
नहीं मिला परिणाम तो क्या पैसे लौटाइये ?
वे बोले-
जरूर मिलेगा
पहले ये जमालघोटा की
गोलियाँ तो खाइये!

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 लडकियों की” हैलो- हाय” 

एक को लाइन मारे
दूजे को सताय
तीजे को तडफाय
चौंथे को फसाय
पांचवे के साथ मंदिर जाके
छठे के साथ फेरे ले जाए

ऐसी ही होती है लडकियों की
है लो – हाय
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  टाई 
एक पार्टी में मेरा मित्र मुझसे बोला यूं
कवि जी बताइये आप टाई क्यूँ पहनते
मैंने कहा टाई पहनता हूँ इसलिये सुन
क्यूंकि गले में जूते फिट नहीं टँगते
बोला वो कवि जी बहुत खूब बोलते हैं
आपको हमेशा मजाक का ही काम हैं

मैंने कहा टाई पहनता हूँ इसलिए सुन
रुमाल घर रह गया और मुझको जुकाम हैं।


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बदमाश लौंडे 
 
उसको देखा तो लगा मानो मंजिल है यही
उसकी सहेली को देखा तो लगा मानो मंजिल है वही
तीसरी को देख प्यार हो जाता है
चौंथी का घर हमें अपना ससुराल नजर आता है
पाँचवी की माँ हमें अपनी सास नजर आती है
हर मोड़ पर लडकों की मुमताज़ बदल जाती हैं!

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हँसी और जिंदगी
 
एक प्यार तराना लिखता हूँ
जीने का फसाना लिखता हूँ
मैं रोते – रोते भी यारों
हँसने का बहाना लिखता हूँ 
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पत्नी पर बातचीत
 एक राह में चलते चलते
एक मीत मिला
मैंने कहा वर्खुद्दार
कहा जा रहे हो दौडे दौड़े

वो बोल्या
गुरूजी

भैंस खो गयी है म्हारी
मैंने कहा भाई
हमारी
तो घर पे
रोटी बना रही है 

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हसीना की हँसी
 तेरी हंसी ने हसीना सुन
ऐसा खेल कर दिया
हमे उसी क्लास में
फिर से फेल कर दिया
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डेंजर जीव
लोग अपने बच्चों का नाम रखते हैं
आशू
याशु
वा
सू

तासू
और
महिलाओं में सबसे डेंजर जीव होती है
सासू 
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कवि विनय भारत

 

Sunday, 23 August 2015

कुछ साहित्यिक कविताऐं -भाग-1 -कवि विनय भारत



कहाँ गए भैया-एक बहिन का दर्द 


कहाँ गए भैया
तुम मुझे
छोड़कर
क्या तुम्हे पता हैं
आज
अकेली हूँ मैं

इस राखी को
देख देख कर
रोती हूँ मैं

लगता है भैया
मुझे
अभी अभी तुम आओगे

मुझे चिढ़ाओगे
दस बातें मनवाओगे
फिर ये राखी
बंधवाओगे

तुम पहले नखरे करोगे
फिर दस रूपये दोगे
लेकिन मैं
हाँ भैया मैं
फिर से
तुम्हे पागल
बनाउंगी

तुम्हे पांच सौ
का नोट
दिखाउंगी
जो निकाला था
भैया मैंने

कल रात
तुम्हारी जेब से

फिर मैं तुम्हे
चिढाउंगी

तुम झगडा करोगे
गुस्सा करोगे
माँ
हमे डाटेगी

फिर हम हंसेगे
भैया
तुम पतंग उड़ाओगे

मैं चरखी पकड़ूंगी
तुम्हारी पतंग को
दूर
तक
देखती रहूँगी

पतंग कट जाएगी
तुम
गुस्सा हो जाओगे

मैं तुम्हे मनाउंगी
तुम मुझसे
उधार
पैसे मांगोगे
मुझे पता हैं
तुम कभी भी

वो पैसे नही
लौटाओगे

लेकिन तुम्हारी
एक हंसी

देखकर
मैं खुशहो जाउंगी
भैया तुम
चले गए हो
इतनी दूर

जहाँ से नही
आया कोई
जाकर वापस

भैया
तुम्हारी याद आती हैं
ये राखी का दिन
कब ढलेगा

कब सूर्यास्त होगा
ये सोंचकर ही
भैया
आँखे रोती
हैं
कैसे रोकूँ भैया अपने को

मन नही मानता
माँ रोती है
पापा मन ही मन घुटते हैं
भैया याद आता हैं
बचपन

वो लड़ाई झगडे
वो नटखटपन
भैया
आ जाओ एक बार
तुम्हे
राखी बंधना चाहती हूँ

तुम्हारे साथ झगड़ना चाहती हूँ
तुम्हारे कंधे
पर सर
रखकर रोना चाहती हूँ

एक बार तो
बताओ
भैया तुम कहां हो…

भैया तुम कहाँ हो…
————–
एक दिवगंत भाई की बहिन के लिए ये त्यौहार दुःख और अभिशाप बन जाता हैं
उफ़ 



************************************
पिताजी 

कभी वो मेरे पास आते
हाल पूंछते गले लगाते
कभी कभी अतिश्योक्ति कर
मेरा जग को नाम बताते
मैं पहले तो डरने लगता
सोचने लगता
कभी कभी जब मैं गिर पड़ता
दौड़ दौड़ कर
फिर वे आते
मुझे उठाते

गले लगाते
हाथ से अपने मेरे पैरों पर
दवा लगाकर
मुझे सुलाते
कभी कभी जब जल्दी होती
मेरे जूते पोलिस करते
वस्त्र प्रेस कर
मुझे सजाते
कभी कभी
जो
मैं चिल्लाता
माँ को
फिर से
डांट लगाते
मुझे समझते
मुझे मनाते
खुद वो सूखी रोटी खाकर
मुझे अनेक
पकवान खिलाते
कभी कभी यूँ लगने लगता
मानो मैं कोई स्वर्ण रतन हूँ
या फिर हूँ
चाँदी का खिलौना
जिसको लेकर
बुनते हैं
तो
अपना अनुपम
स्वप्न सलोना
जब जब मैं
पैसे लेता था
कभी मना वे नही कर पाते
खुद अपनी इच्छा और श्रम से

मुझे सुखों की सैर कराते
कभी कभी जब
बारिश होती

खुद भीगते
मुझे बचाते
सर दर्द की एक गोली
खुद न खाकर
मुझे खिलाते
हृदय विशाल इतना था उनका
जब जब गलती करता था मैं
हलकी सी बस डांट डपट
और कभी कभी
फटकार लगाते
फिर मेरे रूठे होने पर
रात रात भर
आंसू बहाते
और मैं उनको
देखता रहता
इकटक यूँ ही
देखता रहता
लगता हैं मुझको
कभी कभी
जिस दिन
साथ नही होंगे
कैसे
जी पाउँगा
जीवन
जब मेरे पास नही होंगे
चिल्लाता हूँ
चीखता हूँ मैं
कभी कभी
उनकी बातों पर
चरण भी न छुए है मैंने
कभी किसी भी त्योहारों पर
फिर भी आत्मा उनकी कहती
दीर्घ जियो और सुखी रहो तुम
मैंने जो भी उनसे चाहा
दुगना लाकर मुझे दिया
फिर क्यूँ मैंने यूँ उनको
बुढ़ापे में छोड़ दिया
क्यों भूला हूँ
उनका जीवन
अपना बचपन उनका
वह श्रम

याद करूँ तो
आँखों में
आंसू अब आते जाते हैं
जो कभी मखमली बिस्तर देते
आज घांस पर सो जाते हैं
मुझे यूँ बैड पर सोता देख
आज भी वो खुस हो जाते हैं
मैं
इतना निर्मोही क्यूँ हूँ

क्यों उन्हें समझ नही पाता हूँ
क्यों मैं बार बार झगडा कर
उन्हें ह़ी नीचा दिखता हूँ
क्यों वे
मुझे कुछ कह नहीं पाते
क्यों

सब कुछ सुनते रहते हैं
शायद पुत्र की सोंच बदले
पिता गलत कभी
नही होते हैं
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एलबम की दुनिया ...

ये एलबम नहीं है
ये झलक है
उन पलों की
जो याद दिलाते है
मानव को सुख की
उन खुशियों की
जो उसने अर्जित की थी
कभी

ये संग्रह है
उन सपनों का
जिनको पूरा करने का
ख्वाव
देखा गया था
उसके द्वारा

ये
एल्बम नहीं
ये तो जिदंगी के
वे खुशनुमा पल है
जो बिताए थे
परिवार के साथ
दोस्तों के साथ
समाज के साथ
दो पल सूकून से
काटा था जीवन
ली थी राहत की साँस

ये तो याद दिलाती है
उस वक्त की
जब घर परिवार
आदि की
चिन्ताओं से
मुक्त होकर
झूम रहा था मन
मस्ती के सागर में

हाँ,
ये सिर्फ एल्बम नहीं है

वास्तव में
ये तो वह छत है
जिसके नीचे
बाप- बेटे का
झगड़ा नहीं
स्नेह
दिखाया जाता हैं
अरे! यही तो वो घर हैं
जहाँ बूढ़ी माँ को
बेटा
गाली नहीं
प्यार के
दो
मीठे बोल
सुनाता हैं

हाँ, यही तो है
वो संसार
जो
पत्नी को
तलाक की नहीं
विवाह की याद
दिलाता हैं

हाँ ,यही तो है
वो घर बार
जो
एक भाई को
भाई से
गले मिलाता हैं

हाँ -हाँ
यही तो हैं वो
जगह जहाँ
एक फटेहाल
गरीब भी
अफसर बनकर
आता है

जी हाँ , यही तो हैं वो
पवित्र जगह
जहाँ
सभ्यता संस्कृति
संसकारों की
सरिता
बहाई जाती हैं
अरे !
यही तो हैं वो जहाँ
मुन्नी बदनाम नहीं
महान दिखाई
जाती हैं
सिर्फ यही,
हाँ ,
यही हैं वो
जहाँ
बहू विदेश से
सास को
मिलने आती है
अरे!
यही तो हैं वो
जो
नाती को
नाना,
पोते को
दादी की गोद दिलाती है
यही तो है जहाँ
छिपा रहता हैं
पिता की मुस्कान
के
पीछे का संघर्ष
यही तो है वो जहाँ
छिपी हैं कालेज के
दिनों की अठखेलियाँ
वो शरारतें
वो कैंटीन
वो दहीबड़े
वो इमलियाँ
वो सखी सहेलों का
हँसीठोला

वो कालेज पिकनिक
वो पहला पहला प्यार

हाँ,हाँ ये सिर्फ
एल्बम नहीं
ये एक दुनिया हैं
आपके जन्म से
बुढापे तक की
ये दुनिया है जो
बताती है
इस दौड – भाग की
जिंदगी में
रूके थे
दो मिनट कभी
इस फोटो को
खिंचाने को

जी हाँ ,
यही है वो
जो शहीद की माँ को
धैर्य बंधाती हैं
यही विश्व को
“वसुधैव कुटुम्बकम्”
सिखलाती है
सिर्फ यही तो हैं जो
भूतकाल को
वापस लाती हैं
यही एल्बम
आंसू और मुस्कान लाती हैं
यही तो हैं जो
रिश्तों की बुनियाद बनाती है
हाँ , ये एल्बम नहीं हैं
ये सिर्फ एल्बम नहीं हैं

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 “कालपुरुष” 


ऐसा कौन विजेता
जिसने काल को जीत लिया है
काल के मुख मण्डल से
किसका इतिहास बचा है
।काल के अट्टाहास को
कौन जो रोक पाया,
किसने काल के सीने पर
विजय का झण्डा है लहराया?।
कालदेव है वह विजेता
अब तक रहा अमर है,
अथ से लेकर इति तकधरा पर
मृत्यु हीएक सच है।
काल विजेता बनने अब तक जाने कितने आए
किसमे इतना साहस है,
जो काल को मार भगाये ।
वीरों के हाथों मे चाहे
लोहे का दम भरा है,
फिर भी अन्त मे वीरों को
काल के युद्ध में मरना पडा है।
नही जीत पाया है ,
ना कोई जीत सकेगा
बस एक ही सच है
इस धरा पर
काल ही अमर रहेगा
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म और माँ 
  “म”
ऐसा शब्द
हटाने पर जिसे
बिखऱ जाती है
भाषा हिन्दी,
संस्कृत भी
कहाँ टिक
पाती है
“म” के पुत्र
अनुस्वार के बिना
इसी “म”
की
एक महिमा है
“माँ”
जिसके बिना
कहाँ चल सकता है
कोई संसार,
वह माँ
जिसका आँचल
सिंहासन से
बढकर है

उसी “म”
शब्द से
बना हूँ
“मैं”

जो करता हूँ
शरारत
विविध अठखेलियाँ,

हाँ,
“म” शब्द से
बनी है
प्रकृति की
अनुपम छटाकृति
“माँ”

उसी माँ से
बना हूँ
“मैं”

आखिर
मिलता जुलता ही है

“म” और माँ
से
मेरा संबंध
“म” से बना
‘मैं’

व्यवहार में
‘माँ’
से आया मैं
संसार में


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‘‘कॉलेज का एक लड़का”
एक कॉलेज का लड़का वो
रोजाना सपने सँजाता है।
एक झलक पाने के लिए
रोजाना कॉलेज आता है।
बालों को वह सॅवारता
आईने में वह निहारता।
जूते पॉलिश चमकाता सा
इत्र से शरीर महकाता है।
जीन्‍स शर्ट टी शर्ट कभी
कभी सादा वस्‍त्र उठाता है।
रोज-रोज सज सँवर वह
पढ़ने कॉलेज आ जाता है।
कभी कक्षा से बाहर आता
कभी पानी पीने जाता है।
कभी ताँक झॉककर देखता
कभी बहाना कोई बनाता है।
बस एक झलक पाने को
रोजाना कॉलेज आता है।
उस लड़की में भी बात कोई
इठलाती है, इतराती है।
उस लड़के को देख-देख
हँसती है चली जाती है।
वह लड़का एक दीवाना था
रातों करवटें बदलता है।
सपने में बस उसी परी के
यशोगान वह गाता है।
और उसकी एक झलक
पाने को रोजाना कॉलेज जाता है।
वह लड़की नहीं चितचोर वह
उससे नजरें मिल जाती है।
ना वह कुछ भी कह पाती है
ना लड़का कुछ कह पाता है।
दिन, साल, महीने बीत गए
लड़का बस आँसू बहाता है।
प्‍यार भी क्‍या चीज है
अनेकों रंग दिखाता है।

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वो कोई और हैं 
 वो कोई और हैं
जो
लिखता हैं
कविता कहानी और व्यंग्य
मैं हूँ साधारण
वो हैं विशिष्ट
कभी कभी
हावी होता हैं
वह
जबरन मुझ पर
और घिसता है
स्याही

लीपता हैं
कोरे कागज
फिर
निर्मित होता हैं

नया साहित्य
जी हाँ

वह मैं नही
जिसे देखते हैं
आप अखवारों में
पत्रिकाओं में
या
किसी मंच पर

बोलते हुए
वह मेरे अन्दर
का
इन्सा है
कोई दूसरा इंसा

उसके जागते ही सो जाता हूँ
मैं
एक गहरी नींद
में

उठने पर
लिखा मिलता हैं

कुछ उसका सन्देश
जो चाहता हैं
मुझे कुछ कहना

फिर
कैसे कहूँ
कि

वह मैं हूँ
क्योंकि

मुझे पता हैं
वो कोई और हैं


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ये कैसा बदलाव 
शऱीऱ में
जगह -जगह
उग रही है
घांस

काली घांस
कुछ लोग जो
इस घांस
को
सजाया करते
हैं

कहीं सफेद
तो
कहीं
भूरी

कभी देशी
तो
कभी विदेशी
सलीके में
खिली हुई

कभी अलग थलग
सी
खडी हुई
कभी
पीछे की ओर
मुडी हुई

रंग-बिरंगी
ये घांस

पर क्या…
ये
विदेशी नकल
यूँ ही
भुला देगी
संस्कृति
हमारी सभ्यता
हमारा परिवेश

आखिर
कैसा है
ये
बदलाव

क्या रुक जायेगी
ढलती उम्र
इस
घांस को
रँगने से ¿
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 जीवन चक्र
देखा हैं मैंने
एक बीज को वृक्ष बनते हुए
फिर पतझड़ में
झडते हुए

जामी में दबते हुए
एक नया बीज बनाने को
हाँ यही है
इस संसार का

जीवन चक्र
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ये झूमता सा सावन
ये खुशियों के पल
ये मस्ती के मौसम
ये झूमता सा सावन
ये मदमस्त सी हवाएं
ये मन में फुहारें
ये चलती बहारें
दे रही है खुशियाँ और शुभकामनाएं
——
झूमते सावन को भेंट
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मेरी आने बाली पीढ़ी के लिए एक कविता

मेरे
पुत्रों
मेरे
प्रपौत्रों

मेरे आने
बाली पीढ़ी

के रिश्तेदारों
और
वे लोग
जो जानते हैं
मेरे बारे में
थोडा कुछ
उन सभी से
कहता हूँ मैं
मेरे जाने के बाद
जब तुम सभी

पढोगे
हिन्दीसाहित्य डॉट ओ आर जी
पर
मेरी रचनायें
जब पढेंगे
तब तक
नही रहूँगा
मैं
इस संसार में
न होगा मेरा कोई
बजूद

बची रहेंगी
मेरी यादें
और मेरे ग्रन्थ
आज दो हजार चोदह
सन में
तेबिस अगस्त

को
केवल

इसलिए
कि
तुम याद रख

सको मुझे
एक कवि के रूप में
एक साहित्यकार के रूप में
मैं चाहूँगा
इस
वंश

में पैदा होते रहे
इसी प्रकार
से कविगण
जैसे यहीं
हुए हैं अभी तक
गोपीनाथ चर्चित
मेरे रिश्ते में ताऊ
उनके बाद
इश्वर ने दिया था
ये
मौका

मुझे
इसके बाद कौन
होगा
कौन जाने
लेकिन
ये
कविता
जो तुम्हे
मेरा आशीर्वाद हैं
जनता हूँ मैं
जब तुम
पढोगे ये कविता
तब तक
हो चूका होगा
इस
धरा
पर मेरा
जन्म
कही किसी
रूप
में

फिर भी साथ
रहूँगा मैं
तुम्हे
याद रहूँगा
मैं
इसी साहित्य के माध्यम से
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 विनय भारत