Sunday, 2 April 2017

अपने को बच्ची कहती ह .....(कविता) विनय भारत

उन लडकियो को जो झूठ बोलकर माँँ बाप को धोखा देती है और गलत कदम उठाती है जिन्हे माँ बाप कुछ कह तो नही सकते लेकिन उनके भाव यही होते है ----------------------------------------------------------------- 

तुझे जन्म दिया तुझको पाला
तुझको सब अपना दे डाला
आखिर ऐसा क्यूँ काम किया

तूने हमको बदनाम किया

तू रोज यूँ कॉलेज जाती ह

तू हंसती ह मुस्काती ह

तू मन ही मन में आखिर क्यों

हमसे कुछ भी छिपाती ह

आखिर तुझको क्या हो गया

मेरा स्नेह अपार कहाँ खो गया

क्या ऐसा भी कोई होता ह

आखिर क्यों ये जग सोता ह
माँ के प्यार से कैसे बड़ा

बॉयफ्रेंड का प्यार भी होता ह
तुझे इसीलिए नही पाला ह
तुझको न मन से निकाला ह
गई पढ़ाई करने स्कूल तू
फिर क्यों ये झमेला पाला ह
तू फिर आखिर पढ़ाई भूल क्यों ऐसे खोने लगती ह
उम्र से पहले ही शादी के क्यो सपने सजोने लगती ह
हम प्रेम विरोधी नही बेटा
हम तेरे रोधी नही बेटा
फिर क्यों तेरे इस झूठ से सुन
आखिर अपना माथा ऐठा
अरे प्रेम दोस्ती की छूटे जो तुझको अच्छी लगती ह
वो केबल कल्पना की दुनिया बेटा
कल्पना में सच्ची लगती ह
ना कोई ताजमहल होता
न कोई चाँद यूँ लाता ह
सब तेरे खुलेपन का ह असर
बस वही उन्हें बहकाता ह
कुछ बहुत नगीने होते ह
बस कुछ ही महीने होते ह
लूटकर एम् एम् एस बना
वे उड़ते रफू चक्कर होते ह
तू आखिर क्यों ये समझ नही
अच्छे बुरे की पहचान नही
ये फ़िल्मी जगत बस फ़िल्मी ह
सचाई का यहाँ काम नही
नही कोई शाहरुख न सलमान
न कोई प्रेमी चक्कर होता ह
जिसको ह यहाँ पैसे मिलते
बस वो ही गब्बर होता ह
तुझे पता भी क्या इस दुनिया का
कोई अफ़ज़ल सच्चा नही होता
जो अपने धर्म का नही हुआ
वो तेरा कोन कहाँ होता
जिनके यहाँ रिश्तों में पागल
शादी संबंध बन जाते ह
ऐसे लोग किसी के कैसे
धर्म भाई बन पाते ह
तुम कल तक जिसको भैया बोल पगली
घर पे लेके आती थी
तुम्हारे पापा की आँखें फिर भी सहती जाती थी
तुम्हारे फेसबुक पे उसके कमेंट भी सब कोई पढ़ते थे
तुमसे कुछ भी नही कहते थे
क्योंकि सब तुम्हे समझते थे
प्यार का धर्म नही होता
लेकिन वो बेशर्म नही होता
हम भी तुम्ही को चाहते ह
माँ बाप से बढ़के नही होता
लाडो हमको भी तेरे सुख दुख जीवन की चिंता ह
पढाई के बाद तेरी शादी का होना भी पक्का ह
फिर मस्ती और इस फैसन में
आखिर तू क्यों खो जाती ह
आखिर क्यों माँ बाप की आँखे
नज़र तुझे नही आती ह
इस वासनियत की दुनिया में
सच्चा प्यार कही नही होता ह
जो सच्चा प्यार करे पगली
माँ बाप का आँचल होता ह
विनय भारत

Thursday, 25 August 2016

अजब हो रही है...गज़ब हो रही है


अजब हो रही है गज़ब हो रही है
देखूँ तुझे तो गज़ल हो रही है
तेरा यूँ लटोँ को लपकना झटकना
मेरा यूँ तेरे पीछे दर –दर भटकना
हसना लजाना लपकना झपकना
तेरा मुझसे आकर जरा सा चिपकना
ये दुनिया को कैसी जलन हो रही है
अजब हो रही .....
कि देखो भ्रमर आके बैठा जहाँ पर
समझ फूल सुन यूँ तेरी नासिका पर
उछलके वो तेरी अजब बौखलाहट
तुझे छेडती वो मेरी मुस्कुराहट
फिर दोनोँ का हँसना ,वो मस्ती का झरना
मोह्ब्बत कि कैसी तपन हो रही है
अजब हो रही है....
मोहल्ले मेँ दोनोँ का छुप – छुप के मिलना
कभी मिल्क डेरी का छीना झपटना
तेरा रूस जाना मेरा यूँ मनाना
दिलोँ ही दिलोँ मेँ मचल मुस्कुराना
ये पडोसी को कैसी जलन हो रही है
 अजब हो रही है...गज़ब हो रही है

रचनाकार – विनय भारत


1. दिल की गली में हलचलों का नाम आहटें .............. vinay bharat sharma

दिल की गली का जब कोई दरवाजा खुलता है                                                                                                
 चितचोर कोई चोरी करने दिल में घुसता है                                                                          
  आंखों के रस्ते सीधा दिल में उतर जाता है                                                                       
  कितना भी बचो यार प्यार हो ही जाता है !!1!!                                                                                             
एक दिल का दूसरे से मिलना प्यार होता है                                                                           
रातों में छुप के आहें भरना प्यार होता है                                                                             
   प्यार नहीं कोई किसी किताब की गज़ल                                                               
 मिल के विछडना और रोना प्यार होता है !!2!!                                                                           
दिल की गली में हलचलों का नाम आहटें                                                                             
 रातों में यादों का सैलाब नाम करवटें                                                                                                          
 दिल ही दिलों में तोडती दम कितनी हसरतें                                                                                     
दो दिल मिले समाज के माथे पे सलवटें !!3!!                                                                                               
दिल को लगाना कोइ बच्चों का खेल तो नहीं                                                                                            
 ये दिल है कोई चायना की सैल तो नहीं                                                                                                 
 इसको लगाने वालों को रोना सदा पडता                                                                                                                               
  दिल तोडने वालों के लिये जेल तो नहीं !!4!!                                                                 
दिल तो है खाट्टा- मीठा सा ज्यों आम का अचार                                                            
दिल में ना फैला कोई यार अपने भ्रष्टाचार                                                                  
 ज़िंदगी में जवानी और दिल का ऐसा खेल है                                                          
  मंज़िल है इसकी शादी मंडप इसकी रेल है!!

                                              
           रचनाकार -      विनय ‘भारत’

Wednesday, 30 September 2015

प्रेम की गली से निकले दिलजले स्टेट्स - कवि विनय भारत

कहाँ हो तुम -विनय भारत

आज तुमने दिल तोड़ने की बात
क्यों कर दी

मैं तो आज दिल तुम्हे ही देने बाला था
कहाँ गयी हो छोड़कर मुझे
अय हंसी

मैं तो अभी खुद ही तेज
रोने बाला था 



.............................................................

इंतज़ार – कवि विनय भारत

वो बारिश को अपना दुश्मन मान बैठे भारत
कम्बख्त हम थे
की
छतरी खोले
उनका इंतज़ार करते रहे
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यादें -कवि विनय भारत

जो तेरी एक झलक देखी
तो मन खुशियों से झूम गया
मनो कोई डूबते प्राणी को
सागर में कोई सहारा हो
तेरी यादों में रो रोकर
जो पन्ने हमने लिख डाले
मेरे जीवन की ये यादें
जो तू पढ़ती तो तू रोती 
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ये बेदर्द जमाना – कवि विनय भारत

ज़माने ने हमे अब तक दिया ही क्या है
भारत
ये तो हम हैं
की
ज़माने से अब तक

दिल लगाये बैठे हैं
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इस प्यार को क्या नाम दूँ – कवि विनय भारत

बिस्तर पर न नींद यहाँ
चेहरे पे उदासी छायी हैं
क्या नाम रखूं इस प्यार का
बस
लिखने की कलम उठाई हैं

ए खुद तू ही बता
ये प्यार हैं या है पागलपन
क्या नाम दूँ
इस प्यार को
जिसने

आँखे मेरी रुलायी हैं
..........................................................................................................................

कहाँ हो तुम -विनय भारत

आज तुमने दिल तोड़ने की बात
क्यों कर दी

मैं तो आज दिल तुम्हे ही देने बाला था
कहाँ गयी हो छोड़कर मुझे
अय हंसी

मैं तो अभी खुद ही तेज
रोने बाला था 
..................................................
 

कुछ छोटी छोटी दिल से कविता-विनय भारत

तुझे छूकर हवा मेरे पास आई
लगा जैसे तुम ही
यूँ
छूकर गए मुझे …
……………………………………………………………
2.
तुझे मानना तो आता हैं
मेरे दोस्त मुझे
पर
सोचता हूँ
तुझे नाराज़ क्यूँ करें
…………………..
…………………………………………….
3.
तुझे कुछ इस कदर
चाहते हैं अय दिल
चाहकर भी तुझे यूँ कभी हम
छोड़ नही सकते
…………. ……………………………
4.
तुझसे प्यार इतना हुआ हैं अय परी
कि
देखे बिना अब तुझे दिल
मेरा नही लगता
……………………………………
6.
तुझसे करते भी हैं
तुझपे मरते भी हैं
तुझे पता नही अय दोस्त
हम
तेरे भाई से डरते भी हैं

...................................................................................................
 
 
 
कवि विनय भारत

Thursday, 27 August 2015

कुछ व्यंग्य कविताएं -भाग -1 - विनय भारत

बी एड वर्क 


मैंने अपने मित्र से कहा
एक मन कहता हैं
कहानी लिख

एक मन कहता हैं नाटक लिख
एक
कहता हैं लघुकथा लिख

कभी कहता है
लिख डाल
कविता

समझ नहीं आता
लिखूँ
तो क्या लिखूँ

तभी तपाक से मेरा मित्र बोला
ना हिंदी लिख ना बिंदी लिख

अबे
साहित्य छोड

पहले सैशनल लिख


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प्याज पर बबाल 

मेरे मित्र के घर इन्कम टैक्स
का छापा पड गया
मैंने मित्र से पूँछा
यार
तू कंगाल गरीब आदमी

तेरे यहाँ छापा क्यूँ पड़ा
तेरे पास काहे की सम्पत्ति थी
वो बोल संपत्ति कहे की यार
बस पांच किलो प्याज थे

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 वाह री दोस्ती
वे बोले –
आप बहुत कम – कम बोलते हो
हमने कहा –
बोलती बंद हो गयी हमारी
जबसे आप दोस्त हुए
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मेरे उपनामकरण पर कविता




मेरे दोस्तों ने मुझसे पूंछा कि
आप भारत क्यूँ लगाते हैं
मैंने कहा –
भारत में रहते हैं भारत की खाते हैं
भारत लगाने में हमारा क्या जाता है
भारत में जन्म लिया भारत में शिक्षा ली है
भारतीय बच्चों को भारत में पढ़ाते है
भारत ही राष्ट्र मेरा भारत ने सब दिया है
भारत की माटी को हम शीश
झुकाते हैं

इसीलिए विनय शर्मा भारत लिखा करते हैं
भारत में रहके विनय भारत लगाते है 

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 मेरे देश की अशिक्षा 

मुझे मेरे देश की
अनपढ़ता का
पता
तब चला

जब एक
रेलवे स्टेशन पर

विक्रेता से
ग्राहक द्वारा
बीडी का बंडल
माँगा गया
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मेरे देश की दुर्दशा 
मुझे मेरे
देश की दुर्दशा
का पता
तब चला
जब एक नोनवेज होटल के बाहर लिखा था

यहाँ बकरे का
“शुद्ध” मीट मिलता हैं
हाय देश की
दुर्दशा
यहाँ भी मिलावट ! 
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मंच सञ्चालन पर तालियों के लिए
दुःख सुख जिसके कभी साथ नहीं
उस जीवन में कुछ खास नही
वो महफिल भी क्या महफ़िल हैं
जिसमे खुलते कभी हाथ नहीं 
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श्री गणेशाय नमः 

 करूँ प्रणाम मैं रणत भँवर को
सुनते हैं जो सबकी पुकार
एकदंत मोदक प्रिय मूषक वाहन
करें कल्याण
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 रिश्ता- ए -दोस्ती
ये दोस्ती नही आसां
बस इतना समझ लीजिये
एक
प्यारका रिश्ता हैं
और निभाते जाना हैं

 **************************
जल्दबाज लोग 
मुझे मेरे देश की जल्दबाजी
का पता तब चला
जब रेल के पायदान
पर
नीचे तक लटकते

लोगों में से
एक फिसल
कर गिर गया

उफ़! 
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प्रयासरत – विविधा 2013 की सम्पादकीय पंक्तियाँ
तुम संघर्ष करो भारत
युग में परिवर्तन आएगा
संकट चाहे कितने आयें
जो होगा देखा जायेगा 
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  अतिथि स्वागत-1
स्वागत में आपके हम मार्ग सजाने आए
हाथों में हम हमारे फूलों की माला लाये
विशिष्ट हो हमारे सम्माननीय तुम हो
तुम्हारे स्वागतम में पलकें विछा के आए 
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  अतिथि स्वागत-2

फूलों से कर रहे हैं स्वागत हम तुम्हारा
हमारे यहाँ पधारे अहसान है तुम्हारा
आप यहाँ पधारे महकी हमारी बगिया
आशीष से तुम्हारे कार्यक्रम सफल हमारा 

 .....................................................

विनय भारत
 

 


विनय भारत का हास्य व्यंग्य - एक कवि सम्मेलन में

हमारा कुलटा भाग्य कहें या सुलटा भाग्य कि हमें एक कवि सम्मेलन का स्नेह भरा आमंत्रण मिला। देखने में आमंत्रण कम किसी डाकू का ख्खत अधिक लगा। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे जिन्होंने उस आमंत्रण पत्र की भाषा को सुसज्जित किया। पत्र कुछ इस प्रकार था- कवि हम लोगों ने एक कवि सम्मेलन कराने का निर्णय किया है, आप पधारकर कविता पाठ करें।
पत्र को यदि ऐसे समझा जाए तो-

अरे ओ कवि, अपण ने तुम जैसा कवि लोगन कू सुणवा के लिए एक कवि सम्मेलन करवायो है जल्दी पधार जाइयो वरना मैं जाणत हूं तू रोज सब्जी लेवा बाजार जावे है… नी आयो तो किडनेप कर लूंगो। पत्र के नीचे सम्पूर्ण आयोजन समिति के सदस्यों के इतने नाम और दूरभाष थे कि कवियों की संख्या कम आयोजन समिति के सदस्य अधिक थे मानो हर कवि अपनी श्रद्धानुसार जो भी दान-पुण्य करेगा ये उसे मिल बांटकर खा-पी लेंगे।
जो सज्जन पत्र लेकर पधारे वे भी किसी डाकू से कम नही थे। पहले तो हम उन्हें देख घबराए एवं दौड़कर सीधे अंदर घुस गए हमें लगा कि ओसामा लादेन घर में घुस गया है। बाद में पता चला वे वीर रस के कवि थे। रचना के अनुसार उनका शरीर था मुझे सौ प्रतिशत विश्वास है कि इस शरीर के साथ कविता पाठ करते हुए इन सज्जन ने चार पांच मंच तो यूं ही तोड़ दिए होंगे। नाम भी बडा विचित्र था। टमटम भारीभरकम, खैर हमने आमंत्रण स्वीकार किया। भारी भरकम जी हमें आमंत्रण पत्र देकर गुजर गए। कवियों के लिए सुनहरी और श्रोताओं के लिए कत्ल की वह रात आ ही गई। रात आठ बजे कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। बेचारे बीवी की फटकार से परेशान तीन-चार सौ श्रोता कवियों से अपने दिमाग का मुण्डन संस्कार कराने आ ही पहुंचे। मंच के पास पंडाल लगा था और इस रात मंच पर अपना जलवा दिखाने वाले कवि कुर्सियों पर सजा सजाकर रखे हुए थे। एक दो कवि बंधु शरीर में इतना फैले हुए थे कि कुर्सियां और उनका शरीर आपस में कुश्ती कर रहे थे। अंततः उनके शरीर की जीत हुई अथक परिश्रम के बाद उनका पिछवाड़ा मासूम नवयौवना सी कुर्सी पर फंस चुका था। कवियों को काव्य संयोजक टमटम भारी भरकम जी ने मंच पर आमंत्रित किया। एक को छोड़कर सभी कवि मंच पर जा गिरे। शेष बचे हुए एक कवि बेचारी कुर्सी से अपना पिछवाड़ा छुडाने की कश्मकश में लगे रहे। आखिर कुर्सी ने उन्हे अपना मान लिया था अतः कुर्सी भी शरीर को पकड़ बैठी रही, चारों ओर हंसी का माहौल था। दो-चार कार्यकताओं ने कवि जी के पिछवाड़े से कुर्सी को खींचा, कुर्सी रानी ने भी थोड़ी देर ना-नुकुर करने के बाद कोप भवन छोड़ दिया। कुर्सी से पिछवाड़ा इतनी जोर से छूटा कि कवि जी सीधे मंच पर सष्टांग करते नजर आए। कवि जी से पूछने पर पता चला कि वे मंच पर चढने से पहले ऐसे ही प्रणाम करते हैं।
खैर, कवि सम्मेलन का प्रारंभ होने से पहले ही एक महा मुठभेड़ हो गई। दो कवि मंच संचालन करने के लिए आपस में भिड़ गए, अंत में शेष कवियों ने जय और वीरू की तरह सिक्का उछालकर और एक कवि को कवयित्री के पास बैठाने का लालच देकर जैसे-तैसे शांत किया। मंच संचालन करने की महा-मुठभेड़ में टमटम भारी भरकम जी वियजी रहे बडे अभियान से भरे हुए टमटम जी ने इस जीत को ईश्वर की कृपा, कविगणों का सहयोग, और श्रोता जनार्दन का आशीर्वाद बताते हुए स्वयं की जीत न बताते हुए जनता की जीत बताया। इसी जीत पर सभी कविगणों को उन्होनें पार्टी देने की घोषणा भी भरे मंच पर की। दरअसल संचालन करने वाले को अन्य कवियों से एक सौ एक रूपये अधिक मिलने वाले थे। खैर, भारी भरकम जी के रटे रटाए शब्द और कविताओं से कवि सम्मेलन की भूमिका बनी। बीच-बीच में टमटम जी बाबा आदम के जमाने के हसगुल्लों की बरसात श्रोताओं पर करने लगे लेकिन सुन-सुन कर पक चुके श्रोताओं ने इसे नकार दिया यहां तक कि संचालक जी के पैरो के पास अंडा और टमाटर आकर गिरा जिसे देखकर टमटम जी खीझ खीझकर श्रोताओं को तालियां बजाने के लिए बाध्य करने लगे। टमटम जी ने अपने संचालन में बडे-बडे साहित्यकारों और कवियों को याद किया ऐसा लगा मानो जयशंकर प्रसाद….. प्रेमचंद…. दुष्यंत…. परसाई…. अज्ञेय…. और निराला टमटम जी के लंगोटिया यार थे और इसी के साथ मानो महादेवी…मन्नु भण्डारी…सुभद्रा चौहान जी से इनका कॉलेज के जमाने का अफेयर चला हो। टमटम जी का वश ही नहीं चला अन्यथा वे भारतेन्दू को अपने चाचा का लड़का ही बता देते। खैर, कवि सम्मेलन का आगाज हुआ- पहले कवि युवा थे और रसराज श्रृगांर में डूबे थे। उनकी कविता में श्रृगांर के साथ-साथ प्रेम था उनके सुनाने की कला से प्रीत हेाता था कि वे पक्के दिल के मरीज थे और उनकी गर्लफ्रेंड उनको धोखा देकर पान वाले चौरसिया के साथ भाग गई थी इसलिए ये गीत लिखकर उन्होंने उसकी याद में कुंवारा ही मरने की भीष्म प्रतिज्ञा की है। कविता समाप्त हुई लोगों के दिल धड़के या दिल का अटेक हुआ ये तो वे ही जानें लेकिन तालियां बजनी थी सो बजती रही।

दूसरे अधेड़ उम्र के कवि थे पता चला वे भी श्रृगांर लिखते थे, युवा कवि के श्रृगांर लिखने का मतलब तो समझ में आता है लेकिन अधेड़ावस्था में श्रृगांर .. शायद भावी जी से सच्चा प्यार नहीं मिला था इसीलिए अब तक तलाश में थे लेकिन वे नही जानते थे कि हर काई अमिताभ नहीं है, खैर उन्होंने कविता शुरू की ….गीत सुनकर लगता था कि अवश्य ही भावी जी ने उन्हें प्रताड़नाऐं दी है उनकी कविता में भावी जी के अत्याचारों को सहने का दर्द था इसीलिए वे अपनी घरवाली से परेशान थे और कोई बाहरवाली ढूंढने की फिराक में थे, शायद इसीलिए वे कवि सम्मेमेलनों में आकर कवयित्रियों के बगल में मंच पर आसन ग्रहण करते थे। उनकी रचना चलती रही और वे पढते रहे… रचना में वे बाहरवाली को याद कर चिल्लाते रहे, बीच-बीच में कनखियों से पास बैठी कवयित्री को घूरते रहे, कवयित्री पर अपने नैनों से वाण चलाते रहे अंततः जन कवयित्री पर उनकी मोहमाया और कविता का नशा जब न चढ सका तब वे निराश होकर अपने स्थान पर आ बैठे। अगले कवि हम ही थे जैसे कुरबानी से पहले बकरे को खूब सजाया जाता है…वैसे हि संचालक ने अपने शब्दो से हमे पेड के झाड पर चढा दिया परिणामस्वरूप हम मंच पर जा टपके। मंच पर हमें देखकर लोगों की हंसी छूट गई कुछ लोगों का और भी कुछ छूट गया हो तो कह नहीं सकते। हम कुछ सुनाते उससे पहले ही माइक ने पीं……पां… सुनाना शुरू किया हमें लगा हमारे आने से माइक भी जोश में है। हम कविता सुनाने लगे लोगों कि तालियां नही बज रही थी शायद विरोधी पक्ष के कवियों ने लोगों के हाथों को बांध कर रखा था, हम भी कम नहीं थे, हमने तालियां बजवाने के लिए उन्हें ईश्वर का वास्ता दिया, कहते ही जो रही सही थी वे भी बंद हो गई। हमें ताली बजवानी थी हमने उन्हें उनकी गर्लफ्रेंड की कस्में दिलाई,कुछ लोगों के हाथ खुले हमें उम्मीद बंधी, हमने अचानक से उन्हें उनकी पत्नि के बेलन का भय दिखाया इतना सुनते ही श्रोताओं के मुख का रंग उड़ गया लेकिन भरे पांडाल में इतनी ताली बजी की हमारे जाने के बाद संचालक ने उन्हें बंद कराया।
हमारे बाद सिलसिला आगे बढाते हुए हास्य कवि चुन्नूलाल फोकटिया मंच पर कूद गए हंसगुल्ले बरसने लगे इसी बीच मंच पर हल्की-फुल्की सुगबुगाहट होने लगी,पूंछने पर पता चला कि कोई कवयित्री जी की मंच के नीचे से चप्पल उठा ले गया है अब कारण या तो ये रहा होगा कि चप्पल ले जाने वाला कवयित्री जी का कोई दिवाना रहा होगा या फिर बीबी के लिए चप्पल खरीदने के पैसे उसके पास न होंगे। खेर, इस दुःखद घटना पर सभी कवियों में शोक की लहर दौड़ गई। आखिर कवयित्री जी की चप्पल थी इसी बीच एक कवि ने इस घटना पर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपने की चेतावनी दी और संयोजक महादेव को दो चार गाली चालीसा के लम्बे-लम्बे पाठ सुनाए इस घटना पर सभी कवियों ने दो मिनिट का मौन रख कवयित्री को काव्यपाठ करने हेतु कहा। कवयित्री ने काव्यपाठ प्रारंभ किया उनकी कविता में चप्पल चोरी जाने का दुःख साफ झलक रहा था, कवयित्री अपने आंसुओं और वेदना को दबाकर बैठी रही हो सकता है वे चप्पल उन्हें अपने पति से भी प्यारी हो शायद इसीलिए काव्यपाठ करते हुए वे बार-बार मंच के इधर-उधर देखती रही और पास बैठे श्रोताओं के पैरो में खोजबीन करती रही।
जब पूरी कविता समाप्त होने तक भी वे अपनी चप्पलें नहीं खोज पाई तो मायूस होकर मंच पर आ बैठी। पास ही बैठे कवि उन्हें सांत्वना देने के बहाने उन्हें छूने का भरसक प्रयास करने लगे। एक दो अन्य कवि भी अब मंच पर माइक के सामने पहुंच गए उनमें से एक तो इतने पतले थे कि यदि वे माइक पकडकर नहीं रखते तो शायद पंखे की हवा का एक झोंका उन्हें उडा ले जाता, उनकी कविता भी उनकी तरत ही पतली थी, पतलू जी अपने शरीर के फायदे गिनाने लगे, हांलाकि शरीर का पतलापन स्पष्ट दिखता था कि भावीजी ने उनके शरीर को नरक जैसी प्रताडनाऐं दी थी यहां तक कि उनके सिर पर एक स्क्रेच का निशान था जिसे देखते ही पता चलता था कि भावी जी ने नारी अस्त्र बेलन का अच्छी तरह से और अपनी पूरी ताकत से प्रयोग किया था।

खैर, पतलू जी अपनी पतली कविता सुनाकर बैठे ही थे कि हवा के एक झोंके ने उन्हें तेज झटका लगा जिससे वे पास ही बैठी कवयित्री जी से टकराने बच गए और भंयकर दुर्घटना होते होते रह गई हालांकि पास ही बैठे कवि की भौंहे पतलू जी पर तन गई ऐसा लगा मानो पतलू जी यदि कवयित्री जी से टच जाते तो उनके पास बैठे कवि द्रोपदी रूपी कवयित्री की लाज बचाने हेतु भीम बनकर पतलू जी रूपी दुर्योधन से मंच पर ही महाभारत का घमासान शुरू कर देते।
इस महा एक्सिडेंट के बाद अंत में संचालक टमटम भारी भरकम अपने शब्दों के मायाजाल को वीर रस में पिरोकर मंच पर जा कूदे। मंच को टमटम भारी भरकम को देखकर ऐसा लगा मानो कुम्भकर्ण की बारी अब आई हो। जैसी वीर रस के कवि से मंच तोडने की आशा थी वह वैसी ही बनी रही। टमटम जी अपने पूरे दम से कविता सुनाने लगे। टमटम जी ने झांसी की रानी से लेकर गांधी जी तक सबको वीर रस में स्मरण किया मानो इन्हीं के आदेश से १८५७ की क्रांती लडी गई हो। टमटम जी ने वीर रस की कविता ऐसे प्रस्तुत की मानो अभी कश्मीर मुद्दे को हल करने के लिए सीधे कारगिल पर जाकर बैंठेगे। टमटम जी मंच पर धमाचौकडी मचाते रहे और उन्हें देखकर पीछे बैठे पतलू जी की हालत पतली होती रही हालांकि टमटम जी घर में पत्नि से डरते थे और मंच पर आदमखोर शेर की तरह उछलते थे।

अंततः कवि सम्मेलन का समापन किया गया। इसी बीच कवियों को लिफाफा देने हेतु बुलाया गया इसीलिए एक दो कवि मंच से कूद पडे और अपने कुरते को मंच की टेबिल पर निकली कील से उखड़वा बैठे कवयित्री जी को संचालक ने अपने जूते उपहार स्वरूप भेंट किए और उनकी दो सौ रूपये की चप्पल के लिए कवियों के लिफाफे से तीस-तीस रूपये की कटौती कर ली गई जिसके कारण संचालक महादेव को दो-चार गाली पाठ फ्री में सुनने को मिला। इसी के साथ सूत जी ने कथा कहना बंद कर दिया।
बोलिए आज के आनंद की जय और कवियों के संसार को भय………

KAVI-
विनय भारत

विनय भारत का हास्य व्यंग्य-‘‘वैशाख का सूरज”

गधा अर्थात्‌ वैशाखनंदन या यूं कहें तो वैशाख का चमकीला सूरज, ऋतुप्रेमी, सीधा साधा मूक सा जानवर।
गधे की जितनी प्रशंसा करें उतना कम। जब भी गर्मी का मौसम हो और जोरदार शंखनाद जैसा क्रमशः साउण्‍ड सुनाई दे जिससे कान के सभी वाद्ययंत्र बजने लगे तो समझिए वैशाखनंदन महोदय आस-पास हैं। प्रकृति ने यदि कोई निरा भोला जानवर बनाया है तो वह है गधा। गधे का स्‍वभाव सरल होता है, इसकी सरलता का पता इस बात से लगता है कि गाँव के बच्‍चे कभी इसके कान मोड़ते हैं तो कभी कोई पीठ पर चढ़कर अश्व आरोहण का सुख प्राप्‍त करते हैं। लेकिन यह सरलबुद्धि जीव सभी को समान भाव से देखता है। वहीं दूसरी ओर घोड़ा हमारे भ्रष्‍ट नेताओं की तरह अड़ियल होता है, जब तक चने की दाल रिश्वत में ना लें, तब तक अड़ा रहता है और कोई कार्य नहीं करता। लेकिन परम दयालु और कृपालु जानवर गधा भूखा रहकर भी काम पर निकल जाता है। मैं ये कहता हूं कि जिसने जीवन में वैशाखनंदन की पीठ-यात्रा नहीं की तो क्‍या फायदा जीने का, उसने उसी प्रकार से यह सुअवसर खो दिया जैसे किसी ठेकेदार से कोई सड़क निर्माण का ठेका मिलते-मिलते हाथ से निकल गया हो।
वर्तमान में इस परम निराले पशु के साथ उसी प्रकार से अन्‍याय किया जा रहा है जैसे भ्रष्‍ट नेता पर ईमानदारी का आरोप लगाया जा रहा हो। किसी की शादी में जाना हो तो घोड़ा याद आता है, किसी को रथ यात्रा करनी हो तो घोड़ों को याद किया जाता है। गधे की जिंदगी ऐसी है जैसे कार्यालयों में गरीब व्‍यक्‍ति द्वारा रिश्‍वत देकर भी काम न बने और वो ऑफिसों में अपनी चप्‍पलें चमकाता रहे।
घोड़ों को छोड़ श्‍वान पर आते हैं। श्‍वान के वर्तमान में पॉचों पंजे घी में और सर कड़ाही में है। जिन लड़कियों की झलक पाने के लिए हजारों लीटर पेट्रोल फूंका जाता है, उन्‍हीं लड़कियों के पास श्‍वान नामक जीव बड़े सम्‍मान के साथ बैठता है। ऐसे में गधा मानवों से श्रेष्‍ठ है। उसके साथ अन्‍याय करना गलत है। मानव गधों का चारा डकार जाता है लेकिन गधा कभी मानव के भोजन पर नजर नहीं डालता। गधा ऐसा जीव है जो भोजन करके सिंहनाद करता है और ईश्वर को चिल्‍ला-चिल्‍लाकर भोजन के लिए धन्‍यवाद देता है, जबकि मानव ईश्वर को केवल संकटों में याद करता है। वैशाख शुरू होते ही यह नाचना शुरू कर देता है जबकि मानव चुनाव के दिनों में ही नाचता है। गधे की दुलत्ती बड़ी कष्‍टप्रद होती है। ये उन मानवों के लिए है जो चुनाव के दिनों में हाथ जोड़ता है और चुनाव के बाद बड़े-बड़े घोटाले करता है, पेट्रोल, गैस पर पांच रूपये से पच्‍चीस रूपये तक बढ़ाता है लेकिन जनता के आक्रोश पर मात्र सत्‍तर पैसे कम करता है। ऐसे सेवाभावी मानवों का स्‍वागत गधे की लात से होना चाहिए।
वर्तमान में ऐसे भ्रष्‍ट नेताओं का स्‍वागत जगह-जगह फूल मालाऐं डालकर किया जाता है। इनका स्‍वागत करने की अपेक्षा यदि उस सरल जीव गधे का स्‍वागत दो पुष्‍प चढ़ाकर किया जाये तो अच्‍छा है। गधा हमें कुछ लाभ तो देता है और नोट-वोट की राजनीति से भी दूर रहता है। खैर! हम तो लेखक है, ऐसे ही कलम घसीटते रहते हैं। लेकिन ये जानकर कभी-कभी प्रसन्‍नता होती है कि अभी कुछ लोग सजग हैं, जो फूल मालाओं की जगह थप्‍पड़, चप्‍पल, जूते का प्रयोग कर रहे हैं। असली फूलों के हकदार और दबंग पुरुष तो वे ही हैं जो गधे और भ्रष्ट नेता में अंतर समझकर अपनी वीरता हाथ-पैरों से प्रदर्शित कर रहे हैं।
॥जय हिन्‍द जय भारत॥
लेखक
विनय ‘भारत’